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Bilaspur Forgot E.Raghavendra Rao: आजादी के नायक ई.राघवेन्द्र राव को भुला बिलासपुर

Bilaspur Forgot E.Raghavendra Rao: जिसने शहर को जगाई थी आजादी की चिंगारी,उसकी प्रतिमा आज जर्जर हाल में

देश की आज़ादी की लड़ाई में अनगिनत वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी।छत्तीसगढ़ की धरती ने भी कई ऐसे सपूत दिए जिन्होंने अपने साहस, त्याग और समर्पण से स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। (Bilaspur Forgot E.Raghavendra Rao)ऐसे ही एक महान सेनानी थे ई. राघवेन्द्र राव, जिनका नाम अब इतिहास की किताबों में सिमटकर रह गया है, जबकि बिलासपुर की आज़ादी की कहानी उनके बिना अधूरी है।

बिलासपुर की आजादी का आधारस्तंभ, पर यादें धुल में दबी,Bilaspur Forgot E.Raghavendra Rao

20वीं सदी में बिलासपुर स्वतंत्रता आंदोलन का एक बड़ा केंद्र रहा।इसी दौर में ई. राघवेन्द्र राव ने अपने वकालत पेशे को त्याग कर देश की आज़ादी की लड़ाई में खुद को समर्पित कर दिया था।वे असहयोग आंदोलन में बिलासपुर से अंग्रेजों के खिलाफ अग्रिम पंक्ति में खड़े रहे। उनकी अगुवाई में युवाओं और नागरिकों ने मिलकर अंग्रेज शासन के खिलाफ आवाज़ बुलंद की थी।राघवेन्द्र राव न सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि एक दूरदर्शी समाजसेवी और प्रखर संगठनकर्ता भी थे।उन्होंने बिलासपुर नगर पालिका के अध्यक्ष रहते हुए कर्मचारियों के लिए खादी पहनना अनिवार्य किया।गांधी जयंती और तिलक जयंती पर अवकाश की घोषणा की, और हर संस्था में राष्ट्रीय ध्वज फहराने व वंदे मातरम गाने का आदेश दिया।

त्याग,संघर्ष और प्रेरणा की मिसाल-ई राघवेन्द्र राव को भुला बैठा शहर

उनके इन प्रयासों ने शहर में राष्ट्रभक्ति की नई लहर पैदा कर दी थी।आज बिलासपुर में उनके नाम पर बना राघवेन्द्र राव सभा भवन उनके योगदान की याद दिलाता है।लेकिन दुख की बात यह है कि भवन के किनारे स्थित उनकी मूर्ति अब जर्जर हालत में उपेक्षित पड़ी है।लोगों को खोजने पर ही पता चलता है कि वहां राघवेन्द्र राव की प्रतिमा मौजूद है। न अधिकारी ध्यान दे रहे हैं, न जनप्रतिनिधि जबकि इसी राघवेन्द्र राव ने बिलासपुर की कई प्रतिष्ठित भूमि, जैसे कंपनी गार्डन और सभागार की जमीनें, दान में दी थीं।ई- राघवेन्द्र राव ने बिलासपुर को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई थी,पर आज उनकी प्रतिमा धूल में दबी है और स्मृतियां भुला दी गई हैं।वो व्यक्ति जिसने पूरे शहर में आज़ादी की चिंगारी जगाई उसे अब इतिहास की धूल से बाहर निकालने की ज़रूरत है।क्योंकि इतिहास तब ही जीवित रहता है, जब हम अपने नायकों को याद रखते हैं। जाने क्या कहते हैं शहर के लोग इनके बारे में….

आजादी के सपूत की प्रतिमा उपेक्षित, जबकि उन्होनें दी थी शहर को पहचान

इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि उन्होंने 1906 में कोलकाता और 1907 में सूरत में हुए कांग्रेस अधिवेशनों में बिलासपुर का प्रतिनिधित्व किया था।(Bilaspur Forgot E.Raghavendra Rao) 1914 में लंदन से वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वे स्वदेश लौटे, तो उन्होंने पूरी तरह स्वतंत्रता संग्राम को समर्पित कर दिया।1915 में नरम और गरम दलों के बीच मध्यस्थता करते हुए उन्होंने एकता का संदेश दिया और कांग्रेस को नई दिशा दी थीं। ई. राघवेन्द्र राव वो व्यक्तित्व थे जिन्होंने बिलासपुर को राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई।आज ज़रूरत है कि हम उन्हें सिर्फ इतिहास की किताबों में नहीं,बल्कि अपने दिलों और शहर की पहचान में फिर से जगह दें।क्योंकि इतिहास तभी जीवित रहता है, जब हम अपने नायकों को याद रखते हैं।

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