एनएचएम और मितानिन हड़ताल से प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था चरमराई

रायपुर। छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों गंभीर संकट से गुजर रही है। प्रदेश के 75 हजार मितानिन और 16 हजार से ज्यादा एनएचएम कर्मचारी हड़ताल पर हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं काफी हद तक इन्हीं पर निर्भर हैं। हड़ताल के चलते टीकाकरण, नवजात बच्चों और गर्भवतियों की देखभाल जैसे बुनियादी काम प्रभावित हो गए हैं, जिससे आम जनता परेशान है।
एनएचएम का उद्देश्य शिशु व मातृ मृत्यु दर कम करना, टीबी-मलेरिया नियंत्रण और स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत बनाना है। राज्य में एएनएम, स्टाफ नर्स, सीएचओ, मैनेजमेंट और सर्विस सेक्टर के 16 हजार से अधिक कर्मी इस मिशन का अहम हिस्सा हैं। लेकिन 18 अगस्त से हड़ताल शुरू होने के बाद से स्वास्थ्य केंद्रों में केवल 38% कर्मचारी ही काम पर हैं।
अधिकांश सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में ताले लटक गए हैं। हड़ताली कर्मचारी संविलियन, स्थायीकरण, ग्रेड पे निर्धारण, पारदर्शी मूल्यांकन, लंबित वेतन वृद्धि और कैशलेस स्वास्थ्य बीमा जैसी 10 प्रमुख मांगें रख रहे हैं। सरकार द्वारा कुछ मांगें मानने के बावजूद, कई मुद्दों पर गतिरोध बना हुआ है।
राजनीतिक स्तर पर भी इस हड़ताल ने तूल पकड़ लिया है। कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर तानाशाही रवैये का आरोप लगाया और कहा कि कर्मचारियों को बर्खास्त कर आंदोलन दबाने की कोशिश की जा रही है। वहीं भाजपा प्रवक्ता का कहना है कि सरकार ने 10 में से 5 मांगें मान ली हैं और बाकी पर बातचीत जारी है।
हड़ताल के कारण प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएं लगभग ठप हो गई हैं। टीकाकरण, प्रसूता देखभाल और सामान्य इलाज बाधित हैं, जिससे स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। अब सबकी नजर सरकार और कर्मचारियों के बीच होने वाली बातचीत पर टिकी है, जिससे समाधान निकल सके।





