हिड़मा के बाद बस्तर में माओवादियों का अब तक का सबसे बड़ा पलायन, 161 ने छोड़ी बंदूक

हिड़मा की मौत के बाद बस्तर में माओवादी संगठन के भीतर बड़ा टूट देखने को मिल रहा है। बीते 10 दिनों में 161 माओवादियों ने हथियार छोड़कर मुख्यधारा में वापसी की है। सुरक्षा एजेंसियां इसे अब तक का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण अभियान मान रही हैं, जिसने चार दशक पुराने विद्रोही ढांचे को हिलाकर रख दिया है।
दंडकारण्य के प्रभावशाली कमांडर हिड़मा के साथ हुई मुठभेड़, और उसके बाद शीर्ष नेता भूपति व रूपेश के सरेंडर ने कैडर में असुरक्षा और नेतृत्व संकट पैदा कर दिया। उसी उथल-पुथल का परिणाम है कि सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर और तेलंगाना क्षेत्रों में बड़ी संख्या में माओवादी संगठन से अलग हो रहे हैं। पिछले 10 दिनों की इस अवधि में 3 करोड़ रुपये से अधिक के इनामी नक्सलियों ने मुख्यधारा का रास्ता चुना है।
इस बीच एमएमसी स्पेशल जोनल कमेटी के प्रवक्ता ‘अनंत’ ने पत्र और ऑडियो संदेश के जरिए 1 जनवरी 2026 को सामूहिक रूप से हथियार छोड़ने की घोषणा भी की है। कैडरों को किसी अभियान में भाग न लेने, आंतरिक संपर्क बनाए रखने और रोज 435.715 फ्रीक्वेंसी पर सुबह 11 से 11.15 बजे तक जुड़ने का निर्देश दिया गया है।
चैतू उर्फ श्याम दादा समेत 10 इनामी माओवादियों ने भी हाल ही में आत्मसमर्पण किया है। 63 वर्षीय चैतू 1985 से संगठन में सक्रिय था और झीरम घाटी हमले से जुड़े दरभा डिविजन का प्रभारी रह चुका है। उसके साथ 8 लाख के इनामी सरोज, 5-5 लाख के इनामी भूपेश, प्रकाश, कमलेश, जन्नी, संतोष, रामशीला तथा 1-1 लाख के इनामी नवीन और जयंति ने भी हथियार त्याग दिए। सभी ने शौर्य भवन, पुलिस समन्वय केंद्र में सीआरपीएफ, एसटीएफ अधिकारियों और आदिवासी समाज के वरिष्ठ प्रतिनिधियों की मौजूदगी में संविधान की प्रति थामी।
मुख्यधारा में वापसी पर चैतू ने कहा कि अब हथियारों की लड़ाई का वक्त नहीं रहा। रूपेश ने भी फैसले का समर्थन करते हुए बाकी कैडरों से जंगल छोड़ जीवन चुनने की अपील की। बस्तर रेंज के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने भी शीर्ष नेताओं से हिंसा छोड़ लौटने का आग्रह किया और इसे शांति एवं विकास की नई शुरुआत बताया।





