बीजेपी के साथ होते हुए भी जयंत चौधरी क्यों उठा रहे मुस्लिमों के मुद्दे?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का हिंदुत्व एजेंडा साफ नजर आता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने अपनी नीतियों और बयानों से यह स्पष्ट कर दिया है कि वह हिंदुत्व को केंद्र में रखकर फैसले ले रही है। ऐसे में बीजेपी के सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के प्रमुख जयंत चौधरी इस मुद्दे पर असमंजस में नजर आ रहे हैं।
बीजेपी के साथ गठबंधन, लेकिन वैचारिक मतभेद
लोकसभा चुनाव से पहले जयंत चौधरी ने इंडिया गठबंधन से नाता तोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया था। इस गठबंधन का फायदा भी मिला—आरएलडी के दो सांसद जीते और जयंत खुद केंद्र सरकार में मंत्री बन गए। यूपी में भी उनकी पार्टी को एक मंत्री पद मिला। लेकिन, अब ऐसा लग रहा है कि बीजेपी के कट्टर हिंदुत्व एजेंडे के साथ जयंत चौधरी तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं।
जयंत चौधरी मुस्लिम समुदाय को खुद से दूर नहीं होने देना चाहते। इसीलिए जब भी योगी सरकार या बीजेपी नेता मुस्लिमों के खिलाफ बयानबाजी करते हैं या सख्त फैसले लेते हैं, जयंत इशारों-इशारों में अपना विरोध जरूर दर्ज कराते हैं।
मेरठ पुलिस ने ईद और अलविदा की नमाज को लेकर सख्त चेतावनी जारी की थी। प्रशासन ने कहा था कि अगर किसी ने सड़क पर नमाज पढ़ी तो उस पर मुकदमा दर्ज किया जाएगा और उसका पासपोर्ट-लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है।
इस फैसले पर जयंत चौधरी ने ट्वीट कर लिखा— “ऑरवेलियन 1984 की ओर पुलिसिंग!” यानी उन्होंने पुलिस प्रशासन की तुलना जॉर्ज ऑरवेल के मशहूर उपन्यास 1984 से कर दी, जिसमें एक निरंकुश सरकार अपने नागरिकों की हर गतिविधि पर कड़ी निगरानी रखती है। जयंत ने यह संकेत दिया कि यूपी सरकार भी इसी राह पर चल रही है।
आरएलडी के राष्ट्रीय सचिव कुलदीप उज्जवल ने भी पुलिस के फैसले की आलोचना करते हुए इसे नागरिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र के खिलाफ बताया।
बीजेपी नेताओं के बयानों पर भी जयंत की आपत्ति
बीजेपी के बलिया से विधायक केतकी सिंह ने हाल ही में एक विवादित बयान दिया था कि “मुसलमानों के लिए अस्पतालों में अलग वार्ड बनाया जाए ताकि वे वहां इलाज करा सकें।”
इस पर जयंत चौधरी ने तंज कसते हुए कहा, “मोहतरमा, इलाज की जरूरत तो है!” यानी उन्होंने साफ कर दिया कि इस तरह के भेदभावपूर्ण विचारों को वह सही नहीं मानते।
इसी तरह, बीजेपी के पूर्व विधायक संगीत सोम ने कहा था कि “काशी और मथुरा के मंदिरों को कोर्ट के फैसले का इंतजार किए बिना बाबरी मस्जिद की तरह गिराकर बनाया जाएगा।” आरएलडी ने इस बयान की भी निंदा करते हुए कहा कि यह पश्चिमी यूपी का माहौल खराब करने की साजिश है।
जयंत चौधरी जानते हैं कि पश्चिमी यूपी में आरएलडी की राजनीति सिर्फ जाट वोटरों पर निर्भर नहीं है। यहां मुस्लिम 30-40% और दलित 25% से ज्यादा हैं, जबकि जाटों की संख्या करीब 20% है। चौधरी चरण सिंह और अजित सिंह के समय से आरएलडी “जाट-मुस्लिम गठजोड़” के आधार पर चुनाव जीतती आई है।
बीजेपी के साथ गठबंधन के चलते आरएलडी के दो बड़े मुस्लिम नेता शाहिद सिद्दीकी और अमीर आलम पार्टी छोड़ चुके हैं। जयंत नहीं चाहते कि उनके बाकी मुस्लिम समर्थक भी उनसे दूर हो जाएं। इसलिए वह बीजेपी के साथ रहते हुए भी हिंदुत्व के मुद्दों पर संतुलन बनाकर चल रहे हैं।
क्या बीजेपी के साथ जयंत चौधरी लंबा सफर तय कर पाएंगे?
जयंत चौधरी के सामने बड़ी चुनौती यह है कि वह बीजेपी के साथ गठबंधन भी बनाए रखना चाहते हैं, लेकिन अपनी पारंपरिक राजनीति को भी कमजोर नहीं होने देना चाहते। अगर वह बीजेपी की हिंदुत्व पॉलिटिक्स का खुलकर समर्थन करते हैं, तो मुस्लिम वोट पूरी तरह उनसे दूर हो जाएंगे। दूसरी ओर, अगर वह बीजेपी की खुलकर आलोचना करते हैं, तो गठबंधन में दरार आ सकती है।
अगले चुनावों में जयंत चौधरी किस दिशा में जाएंगे, यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन फिलहाल वह अपनी सियासत बचाने के लिए हिंदुत्व की राजनीति से दूरी बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।





