Open Pole: पहली बार बिलासपुर पहुंचे पंडित धीरेन्द्र शास्त्री, अव्यवस्थाओं की खुली पोल, नवविवाहित जोड़ों को आशीर्वाद दिए बगैर लौटना पड़ा

Open Pole: बिलासपुर। बिलासपुर में पहली बार पधारे बागेश्वर धाम सरकार पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री। हज़ारों लोगों की आस्था उमड़ी, लेकिन अव्यवस्था ने सबकुछ ध्वस्त कर दिया। दोनों कार्यक्रमों में आयोजनकर्ताओं की अदूरदर्शिता साफ दिखी। न सुरक्षा, न जगह का चयन और न मीडिया का सम्मान। बाबा को एक जगह तो लौटना पड़ा, और दूसरी जगह पहुंचने के बाद भी अराजकता ने श्रद्धा को शर्मसार कर दिया।

पहला कार्यक्रम मिनोचा कॉलोनी के चंद्र चूर्ण त्रिपाठी के यहां रखा गया, जहां बाबा कुछ चुनिंदा लोगों के बुलावे पर पहुंचे। पर आयोजन स्थल की हालत ये थी कि न कोई बैठने का इंतज़ाम था, न भीड़ नियंत्रण। वहां एक खुला नाला लोगों की जान का दुश्मन बना। कई श्रद्धालु उसमें गिरते-गिरते बचे। यातायात पूरी तरह बाधित रहा और कॉलोनी में घंटों अफरा-तफरी का माहौल बना रहा।

साथ हीं साथ पूरा यातायात भी बाधित रहा सड़के जाम हो गई लोगो को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा घंटों वाहनो की लंबी लाइन नजर आई। दूसरा कार्यक्रम चूचूहिया पारा में रखा गया, जहां विवाहित जोड़ों को आशीर्वाद देने बाबा को बुलाया गया था। लेकिन भीड़ इतनी बेकाबू हुई कि बाबा को आयोजन स्थल तक पहुंचने ही नहीं दिया गया।

आयोजनकर्ता जीतू यादव ने कोई इंतज़ाम नहीं किया — महिलाओं की चेन चोरी हुई, पर्स उड़ गए और अफरा-तफरी के बीच बाबा को नव विवाहित जोड़ों को बिना आशीर्वाद और दर्शन दिए लौटना पड़ा। श्रद्धालुओं की आस्था से भरी भीड़ को आयोजनकर्ताओं ने जैसे यूँ ही रामभरोसे छोड़ दिया था। मिनोचा कॉलोनी में जिस घर में बाबा पहुंचे, वहां बाहर एक खुला नाला श्रद्धालुओं के लिए जाल बन चुका था।

धक्का-मुक्की में बच्चे, महिलाएं और बुज़ुर्ग गिरते-गिरते बचे। वहीं, दूसरी तरफ चूचूहिया पारा में हालात और भी बुरे निकले। लापरवाही का आलम ये रहा कि दर्जन भर लोगों के पर्स गायब हो गए, और कम से कम छह महिलाओं की चैनें भीड़ में खींच ली गईं। एक महिला तो अपने मंगलसूत्र की चोरी के बाद फूट-फूटकर रोती रही, लेकिन कोई सुनने वाला तक नहीं था।

ये कोई धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अव्यवस्था और अदूरदर्शिता का नंगा नाच था, जहां बाबा के दर्शन से ज़्यादा जरूरी बन गया। खुद को सुरक्षित बचा पाना। सबसे शर्मनाक बात रही मीडिया के साथ किया गया व्यवहार। रिपोर्टिंग करने पहुंचे पत्रकारों को गेट के बाहर ही रोक दिया गया। न कैमरा अंदर ले जाने दिया गया, न सवाल पूछने का अवसर मिला। पत्रकार धूप में घंटों इंतज़ार करते रहे, लेकिन आयोजनकर्ताओं की प्राथमिकता सिर्फ भीड़ और फोटो तक ही सीमित रही। ऐसे में सवाल उठता है — क्या ये आयोजन श्रद्धा के लिए था, या सिर्फ दिखावे के लिए।

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