ब्रिटिश दौर में देसी शराब के ठेके कैसे चलाए जाते थे और नीलामी कितने में होती थी?

अंग्रेजी शासन को लेकर माना जाता है कि उस समय सब कुछ व्यवस्थित और बेहतरीन था, लेकिन हकीकत इससे अलग थी। देसी शराब में मिलावट, कम नशा चढ़ने की शिकायतें और अवैध उत्पादन—ये सभी समस्याएं ब्रिटिश काल में भी मौजूद थीं। इसी कारण उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में शराब की बोतलों पर सीलबंदी अनिवार्य की गई। उस दौर में ‘अंग्रेजी’ शराब आम जनता तक नहीं पहुंची थी, इसलिए सुल्तानपुर के पास रायबरेली रोड पर देसी शराब की डिस्टिलरी ‘महुए और शीरे’ से दारू बनाती थी। इसमें 30 भट्ठियां थीं, जो जिले की जरूरत पूरी करने में भी कम पड़ती थीं। 1900 में प्रतापगढ़ की डिस्टिलरी बंद होने के बाद वहां की जरूरत भी यही सप्लाई करती थी, जिससे मांग–आपूर्ति का अंतर और बढ़ गया।
उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशक में देसी शराब के ठेकों की नीलामी शुरू हुई और सरकार ने इसे राजस्व बढ़ाने के बड़े स्रोत के रूप में देखा। 1901 में डिस्टिलरी हेड ड्यूटी से 63,000 रुपये और पूरे जिले के 179 ठेकों की नीलामी से सिर्फ 26,000 रुपये प्राप्त हुए। शहर की सबसे महंगी दुकान की नीलामी 1,900 रुपये में हुई। अमेठी और गौरीगंज जैसे इलाकों में पासियों की आबादी अधिक होने के कारण वहां के ठेकों से अच्छी कमाई होती थी। मुसाफिरखाना और शुकुल बाजार के ठेके भी राजस्व के लिहाज से बेहतर माने जाते थे। इसके उलट कादीपुर तहसील सबसे कमजोर रही, जहां सालभर में मुश्किल से 1,000 रुपये की आय होती थी और मुख्यालय की दुकान कभी 12 रुपये से ज्यादा में नहीं उठी।
उस समय ताड़ी भी सरकारी आय का स्रोत थी, जिससे करीब 450 रुपये सालाना मिलते थे। जिले में अफीम की खपत भी दर्ज की गई—1901 में 466 सेर अफीम उपभोग हुई और उससे 1,570 रुपये की आय हुई। गांजा और चरस की बिक्री का भी उल्लेख मिलता है, हालांकि आय का विस्तृत ब्यौरा उपलब्ध नहीं है।
ब्रिटिश अधिकारी नशे के पदार्थों में भी जाति व वर्ग का विश्लेषण करते दिखते हैं। 1903 के सुल्तानपुर गजेटियर में लिखा गया कि देसी शराब मुख्यतः पासियों और अन्य छोटी जातियों की पसंद मानी जाती थी। गांजा हिंदुओं की ऊंची और मजबूत जातियों—विशेषकर ठाकुर और यादव—में लोकप्रिय बताया गया। चरस का उपयोग कमजोर वर्गों में अधिक था, जबकि मुसलमान समुदाय में अफीम का सेवन तो होता था, पर इसे बहुत व्यापक नहीं माना गया।
बीसवीं सदी की शुरुआत में अवैध शराब का कारोबार भी मौजूद था, हालांकि गजेटियर में इसे सीमित बताया गया है। अमेठी–गौरीगंज क्षेत्र में पासियों द्वारा अवैध शराब बनाए जाने का उल्लेख है, लेकिन इसे राजस्व पर बड़ा असर डालने वाला नहीं माना गया। उस समय मुसाफिरखाना, हलियापुर और बल्दीराय के कुछ हिस्सों में अफीम (पोस्ता) की खेती भी होती थी। अंग्रेज इसके लिए प्रोत्साहित करते थे क्योंकि एडवांस रकम मिलने और मिट्टी–जलवायु के अनुकूल होने से लोग इसे लाभकारी मानते थे। महुए की प्रचुरता के बावजूद ताल्लुकदारों द्वारा ‘दो आना प्रति पेड़’ टैक्स लोगों के लिए परेशानी थी।
करीब सवा सौ साल पहले आबकारी मद से सुल्तानपुर में जितनी आय होती थी, उसके मुकाबले 2025–26 में देसी–विदेशी शराब, बीयर और भांग से होने वाला राजस्व कई गुना बढ़ चुका है। यह फर्क बताता है कि अंग्रेजों के समय शुरू हुई ठेका व्यवस्था आजाद भारत में सरकारों के लिए कितना बड़ा आय–स्रोत बन चुकी है।





