छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को हाईकोर्ट से राहत-चुनौती देने वाली याचिका खारिज

बिलासपुर स्थित हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि जब तक अधिनियम को लागू करने की तिथि अधिसूचित नहीं होती, तब तक इसे चुनौती देना समय से पहले है।

इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई।

सरकार ने उठाया ग्राह्यता पर सवाल
राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने दलील दी कि याचिका अभी सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि कानून को लागू करने की तारीख तय ही नहीं हुई है। कोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताते हुए याचिका को खारिज कर दिया।

कब पारित हुआ था विधेयक
छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को 19 मार्च 2026 को विधानसभा में पारित किया गया था और 6 अप्रैल को राज्यपाल की मंजूरी मिल चुकी है। 10 अप्रैल को इसकी अधिसूचना प्रकाशित की गई, हालांकि इसे लागू करने की तारीख अभी घोषित नहीं हुई है।

क्या है कानून में प्रावधान
इस कानून में जबरन, प्रलोभन या धोखाधड़ी से धर्मांतरण पर कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। अवैध धर्मांतरण के मामलों में 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है। संगठित स्तर पर धर्मांतरण कराने पर और भी सख्त दंड का प्रावधान रखा गया है।

राज्य सरकार का कहना है कि यह कानून धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए नहीं, बल्कि गैर-कानूनी तरीकों को नियंत्रित करने के लिए लाया गया है।

याचिकाकर्ता ने उठाए थे संवैधानिक सवाल
याचिकाकर्ता क्रिस्टोफर पॉल ने इसे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया था। याचिका में यह भी कहा गया कि कानून की परिभाषाएं अस्पष्ट हैं और इससे मनमानी कार्रवाई की आशंका बढ़ सकती है।

फिलहाल हाईकोर्ट के इस फैसले से राज्य सरकार को राहत मिली है, लेकिन विधेयक को लेकर कानूनी और सामाजिक बहस जारी रहने के संकेत हैं।

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