36 साल बाद मध्य प्रदेश में माओवादी समस्या पर विराम, ग्रामीणों की रणनीति से मिली सफलता

तीन दशक के संघर्ष के बाद मध्य प्रदेश माओवादी समस्या से मुक्त होता दिख रहा है। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में मलाजखंड दलम के 12 माओवादियों के आत्मसमर्पण के बाद महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ (एमएमसी) जोन में माओवादियों की संख्या घटकर केवल छह रह गई है। इसी क्रम में केबी दलम के 10 सदस्यों ने भी आत्मसमर्पण किया, जिससे मंडला जिला लगभग इस समस्या से मुक्त हो गया है।
एमएमसी जोन में बचे छह माओवादी अब मुख्य रूप से दो मलाजखंड और चार दड़ेकसा दलम से हैं। इनमें दो से तीन महिलाएं भी शामिल हैं। इन बचे माओवादियों में प्रमुख नाम दीपक है, जो बालाघाट जिले के पालागोदी गांव का रहने वाला है। पुलिस ने इन पर घेराबंदी बढ़ा दी है और अनुमान है कि जल्द ही सभी माओवादी आत्मसमर्पण कर सकते हैं।
समर्पण करने वालों में मुख्य नाम रामदेर का है, जो सेंट्रल कमेटी सदस्य था और उस पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। पिछले कुछ महीनों में मलाजखंड और दड़ेकसा दलम के अधिकांश सदस्य भी आत्मसमर्पण कर चुके हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने माओवादी समस्या से 31 मार्च तक मध्य प्रदेश सहित पूरे देश को मुक्त करने का लक्ष्य रखा है। इस दिशा में पुलिस ने ग्रामीणों को सुरक्षा का भरोसा दिलाया, पुलिस बल बढ़ाया और विशेष सहयोगी दस्ते की भर्ती की। ग्रामीणों ने माओवादियों का सहयोग करना बंद कर दिया, जिससे माओवादी असहाय हो गए और हथियार डालने को मजबूर हुए।
बालाघाट और मंडला जैसे जिलों में लाल आतंक का भय समाप्त होता दिख रहा है। बालाघाट में माओवादी वर्ष 1988 से सक्रिय थे और 1991 में यहां के सीतापाला जंगल में हुए विस्फोट में 20 से अधिक पुलिसकर्मी मारे गए थे। इसके बाद माओवादी गतिविधियों पर सरकार की रणनीतिक दबाव बढ़ी और अब सफलता हासिल हुई है।





