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परिसीमन पर चेन्नई में बुलाई गई अहम बैठक, स्टालिन ने बताया ऐतिहासिक कदम

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 22 मार्च को चेन्नई में परिसीमन के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई, जिसे उन्होंने भारतीय संघवाद के लिए ऐतिहासिक बताया है। इस बैठक में कई राज्यों के नेता शामिल होंगे, लेकिन तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने बैठक में भाग लेने से इनकार कर दिया है।

बैठक में शामिल होंगे कई राज्यों के नेता

स्टालिन द्वारा बुलाई गई इस बैठक में कई प्रमुख नेताओं के शामिल होने की उम्मीद है। केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन, तेलंगाना के रेवंत रेड्डी, पंजाब के भगवंत मान और कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार बैठक में हिस्सा लेंगे। इसके अलावा, आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक अपने प्रतिनिधियों को भेजेंगे।

तमिलनाडु की सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) का एक प्रतिनिधिमंडल, जिसमें सांसद कनिमोझी, मंत्री केएन नेहरू और पूर्व केंद्रीय मंत्री ए राजा शामिल हैं, ने 13 मार्च को दिल्ली में रेवंत रेड्डी से मुलाकात कर उन्हें बैठक में शामिल होने का निमंत्रण दिया था।

टीएमसी का बैठक में शामिल होने से इनकार

हालांकि, टीएमसी ने इस बैठक में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है। पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी का कहना है कि वर्तमान में डुप्लिकेट मतदाता पहचान पत्र संख्या का मुद्दा उनके लिए अधिक महत्वपूर्ण है। टीएमसी के मुताबिक, यह मुद्दा बिहार, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों पर असर डाल सकता है।

बिहार में विधानसभा चुनाव इस साल के अंत में होने वाले हैं, जबकि केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में 2026 में चुनाव होंगे।

परिसीमन पर चर्चा क्यों है जरूरी?

स्टालिन का कहना है कि यह बैठक निष्पक्ष प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने और राज्य संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के अनुचित आवंटन के विरोध में एकजुट होने के लिए बुलाई गई है। उनका मानना है कि तमिलनाडु की यह पहल अब राष्ट्रीय आंदोलन बन चुकी है।

5 मार्च को तमिलनाडु में हुई सर्वदलीय बैठक में 58 पंजीकृत राजनीतिक दलों ने भाग लिया और निष्पक्ष परिसीमन प्रक्रिया की मांग की। इस बैठक को भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों की ताकत दिखाने के रूप में भी देखा जा रहा है।

दक्षिणी राज्यों की चिंता

परिसीमन के मुद्दे पर दक्षिणी राज्यों में चिंता बढ़ती जा रही है। उनका मानना है कि जनसंख्या आधारित सीट पुनर्वितरण के कारण उत्तरी राज्यों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बढ़त मिल सकती है, जिससे दक्षिणी राज्यों को नुकसान हो सकता है।

यह देखना दिलचस्प होगा कि 22 मार्च की यह बैठक परिसीमन के मुद्दे पर क्या नतीजे निकालती है। स्टालिन की यह पहल विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश भी मानी जा रही है। अब सवाल यह है कि क्या इस बैठक से कोई ठोस समाधान निकल पाएगा या यह सिर्फ एक राजनीतिक चर्चा बनकर रह जाएगी?

 

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