बड़ा फैसला: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: शरिया कोर्ट नहीं सुना सकता तलाक का कानूनी फैसला
निजी शरिया कोर्ट के तलाक आदेश पर हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, जानिए पूरा मामला

शरिया कोर्ट तलाक का कानूनी फैसला नहीं सुना सकता, (बड़ा फैसला) छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुस्लिम महिला के वैवाहिक अधिकारों से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए साफ किया है कि कोई निजी धार्मिक संस्था या खुद को शरिया कोर्ट बताने वाला संगठन कानून से बनी अदालत का दर्जा नहीं रखता। ऐसी संस्थाएं धार्मिक राय दे सकती हैं, लेकिन किसी व्यक्ति के वैवाहिक दर्जे या विवाह खत्म होने का कानूनी फैसला नहीं कर सकतीं। रायपुर के इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की अदालत ने यह टिप्पणी की।
शरिया कोर्ट के आदेश को हाईकोर्ट ने माना गैर-कानूनी, वैवाहिक स्थिति बदलने का अधिकार नहीं (बड़ा फैसला)
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह समाप्त होने या वैवाहिक अधिकारों में बदलाव का फैसला कानून के तहत सक्षम अदालत या संबंधित प्राधिकारी ही कर सकता है।मामला रायपुर टिकरापारा निवासी निरोश अब्बासी से जुड़ा है। उनके पहले पति की साल 2015 में मौत हो गई थी। इसके बाद उन्होंने 18 जुलाई 2020 को मोहम्मद आबिद खान से निकाह किया। शादी के बाद बच्चों के नए परिवार में तालमेल को लेकर पति-पत्नी के बीच विवाद शुरू हो गया।महिला के मुताबिक, विवाद के बाद पति ने उन्हें तलाक देने की प्रक्रिया शुरू की। पति का दावा था कि उन्होंने तलाक-ए-हसन तीन चरणों में 31 अगस्त, 30 सितंबर और 30 अक्टूबर 2021 को संचार के माध्यम से घोषित किया था। वहीं महिला ने पति और ससुराल वालों पर उत्पीड़न, क्रूरता और दुर्व्यवहार के आरोप लगाए।
मुस्लिम महिला के तलाक मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, निजी धार्मिक संस्था पर सख्त टिप्पणी
मामले में वन स्टॉप सखी सेंटर में काउंसिलिंग भी हुई, लेकिन विवाद का समाधान नहीं हो सका।महिला ने 7 अक्टूबर 2021 को पुलिस अधीक्षक के सामने शिकायत की। इसके बाद 1 नवंबर 2021 को महिला थाना रायपुर में पति और अन्य लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 498-A और 34 के तहत एफआईआर दर्ज की गई।इसी बीच रायपुर के इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट ने 18 जनवरी 2022 के आदेश में महिला को उसके पति से तलाकशुदा बताया। इसी आदेश के कानूनी अधिकार को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी।सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विश्व लोचन मदन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का हवाला देते हुए कहा कि दारुल कजा या फतवा जारी करने वाली निजी संस्थाओं को कानून से स्थापित अदालत का दर्जा हासिल नहीं है।
इनके फैसले बाध्यकारी नहीं होते और इन्हें कानूनी प्रक्रिया के जरिए लागू नहीं कराया जा सकता।हाईकोर्ट ने साफ कहा कि धार्मिक संस्था अपनी धार्मिक राय दे सकती है, लेकिन यह राय किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार या वैवाहिक स्थिति पर बाध्यकारी नहीं हो सकती। यानी किसी निजी धार्मिक संस्था के आदेश से न तो विवाह अपने आप खत्म हो सकता है और न ही किसी पक्ष के कानूनी अधिकार, स्थिति या जिम्मेदारी बदल सकती है।
हालांकि, कोर्ट ने तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता के सवाल पर कोई फैसला नहीं दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके आदेश का एफआईआर या पक्षकारों के अन्य कानूनी उपायों पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा।हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट के 18 जनवरी 2022 के आदेश को कानूनी अधिकार के बिना जारी किया गया आदेश माना। कोर्ट ने दोहराया कि किसी निजी धार्मिक संस्था का आदेश किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति या कानूनी अधिकारों को अपने आप नहीं बदल सकता।





