Seminar: बिलासपुर में संस्कृत विद्वानों का महाकुंभ: डॉ. पुष्पा दीक्षित की ‘पाष्पी पाणिनीय प्रक्रिया’ पर हुआ गहरा मंथन
पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल ने सराहा: कहा- जटिल व्याकरण को सरल बना बिलासपुर को दिलाई वैश्विक पहचान...

न्यायधानी बिलासपुर में आज संस्कृत व्याकरण को लेकर एक ऐतिहासिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। (Seminar) इस कार्यक्रम में देश के कौने-कौने से आए संस्कृत के प्रकांड विद्वानों और विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपतियों ने शिरकत की। संगोष्ठी का मुख्य केंद्र राष्ट्रपति सम्मानित डॉ. पुष्पा दीक्षित का वह क्रांतिकारी शोध रहा, जिसने 12 वर्षों में सीखी जाने वाली संस्कृत व्याकरण को मात्र 6 महीनों के पाठ्यक्रम में समेट दिया है। कार्यक्रम में मौजूद शहर विधायक और पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल ने भी इस पद्धति को भाषा जगत के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया

जटिल व्याकरण को सरल बना बिलासपुर को दिलाई वैश्विक पहचान (Seminar)
बिलासपुर में आयोजित इस विशेष संगोष्ठी में बनारस, जयपुर और कई केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालयों के दिग्गज विद्वानों ने भाग लिया। वक्ताओं ने डॉ. पुष्पा दीक्षित द्वारा प्रतिपादित ‘पाष्पी पाणिनीय प्रक्रिया’ की वैज्ञानिकता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह पद्धति पाणिनि के अष्टाध्यायी को समझने का सबसे सरल और सुगम मार्ग है।
जहाँ पारंपरिक रूप से व्याकरण सीखने में छात्रों को एक दशक से भी अधिक का समय लगता था, वहीं अब नई पीढ़ी इसे कुछ ही महीनों में आत्मसात कर रही है। कार्यक्रम के दौरान न केवल विद्वानों का सम्मान किया गया, बल्कि महत्वपूर्ण पुस्तकों का विमोचन भी हुआ। संस्थान के सचिव ने स्पष्ट किया कि इस आयोजन का उद्देश्य संस्कृत जैसी प्राचीन भाषा को आधुनिक समय के अनुकूल बनाकर उसे वैश्विक स्तर पर पुनर्स्थापित करना है…..
समारोह में मुख्य रूप से उपस्थित पूर्व मंत्री एवं वर्तमान शहर विधायक अमर अग्रवाल ने इस आयोजन को छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय बताया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि भगवान पाणिनि की रचनाएँ संस्कृत का आधार हैं, जिन्हें समझना एक समय में अत्यंत कठिन माना जाता था, लेकिन डॉ. पुष्पा दीक्षित ने अपनी मेधा और शोध से इसे लोक-सुलभ बना दिया है। श्री अग्रवाल ने इस बात पर गर्व जताया कि आज इस शोध का लाभ लेने के लिए न केवल भारत बल्कि विदेशों से भी छात्र बिलासपुर खिंचे चले आते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयासों से हमारी सांस्कृतिक और भाषाई विरासत न केवल सुरक्षित रहेगी, बल्कि नई पीढ़ी में भी संस्कृत के प्रति रुझान बढ़ेगा…..





