MP Jyotsna Mahant:क्यों आहत हुई कांग्रेस की एकमात्र सांसद ज्योत्सना महंत..?

MP Jyotsna Mahant Angry…?
कांग्रेस पर हमेशा एक आरोप लगता है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस एकजुट होने के लाख दावे ही क्यों ना कर ले, पर संगठन के भीतर कई धड़ों में बंटी गुटबाजी किसी ना किसी तरह सार्वजनिक हो ही जाती है। भले ही प्रदेश कांग्रेस के कद्दावर नेता और उनके समर्थक, हकीकत को छिपाने की नाकाम कोशिश में लगे रहते हैं, लेकिन व्यथा ही तो है, जो शब्दों और भावनाओं के तौर पर निकल आती है। जो कांग्रेस के लिए कितनी घातक है, इसका अंदाजा कांग्रेसियों को भी है। बावजूद गुटबाजी है, जो पीछा ही नहीं छोड़ती।
आज जिस मसले को लेकर बात कर रहे हैं, उसका सीधा संबंध कांग्रेस के उन दिग्गज नेताओं से है। जिन्होंने गुटबाजी से ऊपर उठकर कांग्रेस को मजबूत किया था। जिन्होंने कंधे से कंधा मिलाया और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पर विपक्षी दल के टीके को पोंछने में सफलता हासिल की। जिसका परिणाम कांग्रेस को सत्ताधारी दल के तौर पर एक नई पहचान के तौर पर सामने आई।
दरअसल, मसला पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही दौरे से जुड़ा है। बघेल का यह प्रवास जिला अध्यक्ष गजमती भानू के शपथ ग्रहण समारोह को लेकर था। यह सही है कि पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते बघेल कांग्रेस के सर्वमान्य नेता हैं। पर स्थानीयता के लिहाज से कांग्रेस की एकमात्र सांसद होते हुए भी, Jyotsna Mahant को न्योता नहीं दिया जाना, कांग्रेस संगठन के भीतर की गुटबाजी का स्पष्ट प्रदर्शन है। इसके बावजूद सांसद ज्योत्सना महंत का बगैर किसी शिकायत के यह कहना,सूचना मिलती तो जरूर पहुंचती, उनकी निराशा का स्पष्ट प्रमाण है।
सांसद Jyotsna Mahant ने अपनी जो भावना व्यक्त की है, उसका प्रमाणीकरण पार्टी के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं की नाराजगी के तौर पर सामने आया है। बताते चलें कि बीते दिनों पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का गौरेला–पेंड्रा–मरवाही दौरा हुआ था, जिसमें पार्टी के कई पुराने और सभी निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने दूरी बनाए रखी थी। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण सांसद ज्योत्सना महंत का नाम आमंत्रण पत्र में शामिल न होना एवं कांग्रेसजनों को कार्यक्रम का आमंत्रण न दिया जाना।
सत्ता से बेदख हो चुकी कांग्रेस के पास अब भी मौका है। ढ़ाई साल बाद जब विधानसभा चुनाव होगा, तब कांग्रेस सत्ता की रेस में दोबारा शामिल भी होगी। पर रेस में जीत हासिल करने के लिए नीचे से लेकर ऊपर तक एकजुटता भी जरूरी है, जिसका अभाव कांग्रेस में स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है। जिलाध्यक्ष के तौर पर गजमती भानू का शपथ ग्रहण समारोह इसका ताजा उदाहरण है, जिसमें कायदा तो यही कहता है कि स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस पर कांग्रेस नेता उत्तम वासुदेव ने शपथ ग्रहण समारोह में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा दिए गए वक्तव्य को लेकर अपनी बात रखते हुए कहा— “भूपेश बघेल जी एक बड़े नेता हैं और उनकी बात हमारे लिए सिर–आंखों पर है। लेकिन हमने संगठन से जुड़ी किसी भी आंतरिक बात को कभी भी मीडिया के सामने नहीं रखा। हमने जो भी बातें की हैं, वह सिर्फ अपने कांग्रेस परिवार के बीच रखी हैं। क्या अपने परिवार में बात रखना कोई अपराध है? और यदि यह गलत है, तो दूसरों पर कार्रवाही करना मेरी गर्दन अलग कर देना।” सही मायने में यह एक भड़ास है..
वहीं कांग्रेस नेता मनोज गुप्ता ने शपथ ग्रहण समारोह के आमंत्रण पत्र को लेकर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की एकमात्र कांग्रेस सांसद श्रीमती ज्योत्सना महंत का नाम आमंत्रण पत्र में शामिल नहीं किया जाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कई वरिष्ठ कांग्रेसजनों को कार्यक्रम का आमंत्रण तक नहीं दिया गया, जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं की भावनाएं आहत हुई हैं। मनोज गुप्ता ने कहा कि गौरेला–पेंड्रा–मरवाही जिले का एकमात्र विधानसभा क्षेत्र कोरबा लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है, इसके बावजूद उसके सांसद एवं पूर्व विधायक का नाम आमंत्रण पत्र में न होना बेहद चिंताजनक और दुखद है।
बहरहाल दुर्ग से लेकर सरगुजा और रायपुर से लेकर बस्तर तक, कांग्रेस कई धड़ों में नजर आ रही है। भूपेश बघेल, टीएस बाबा, डॉ. चरणदास महंत, ताम्रध्वज साहू, दीपक बैज सहित कांग्रेस के अन्य दिग्गज, एक होते भी एक नहीं है, इसका अहसास भी होने लगा है। जबकि साल 2018 में कांग्रेस को जो जीत हासिल हुई थी, सही मायने में देखा जाए तो इन सभी के सामूहिक प्रयास का ही सुखद परिणाम था।





