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शरिया कानून पर क्यों उठता है विवाद? ट्रंप के बयान और शाहबानो केस से फिर शुरू हुई चर्चा

शरिया कानून एक बार फिर चर्चा में है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण के दौरान लंदन के मेयर सादिक खान पर निशाना साधते हुए कहा कि वह लंदन में शरिया कानून लागू करना चाहते हैं। इसके अलावा शाहबानो केस पर बनी फिल्म ‘हक’ का टीजर भी बहस का नया कारण बना है। ऐसे में एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि आखिर शरिया कानून क्या है और इस पर विवाद क्यों होता है।

शरिया कानून को इस्लामिक सिद्धांत माना जाता है, जो कुरान, हदीस और पैगंबर मोहम्मद के जीवन से जुड़े नियमों पर आधारित है। यह जीवन के कई पहलुओं को नियंत्रित करता है। दुनिया के लगभग 15 देशों में यह पूरी तरह लागू है, जिनमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान, सऊदी अरब, ईरान, यमन और सूडान जैसे देश शामिल हैं। वहीं, मिस्र, बहरीन, ब्रूनेई, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों में यह आंशिक रूप से लागू है। भारत जैसे देशों में इसे केवल निजी मामलों—शादी, तलाक और विरासत—तक सीमित रखा गया है।

सबसे ज्यादा विवाद इसकी कठोर सजाओं को लेकर होता है। चोरी पर हाथ काटने, व्यभिचार पर पत्थर मारकर मौत की सजा और शराब पीने पर कैद जैसी सजाएं अक्सर वैश्विक स्तर पर आलोचना का कारण बनती हैं। पाकिस्तान की ईसाई महिला आशिया बीबी को शरिया के तहत मौत की सजा सुनाए जाने पर साल 2009 में भारी विरोध हुआ था।

भारत में शरिया कानून को मुस्लिम पर्सनल लॉ कहा जाता है। यहां इस कानून को लेकर सबसे बड़ा विवाद शाहबानो केस से जुड़ा है। 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो को गुजारा भत्ता दिलाने का आदेश दिया था, लेकिन 1986 में संसद ने मुस्लिम महिला (तलाक में संरक्षण का अधिकार) कानून लाकर कोर्ट के फैसले को पलट दिया। हालांकि अब तीन तलाक पर कानून बनने से मुस्लिम महिलाओं को सुरक्षा मिली है।

कुल मिलाकर शरिया कानून अलग-अलग देशों में अलग स्वरूप में लागू है, लेकिन इसकी सख्ती और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर असर डालने वाले पहलू ही अक्सर विवाद की वजह बन जाते हैं।

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