Gold Reserves: दुनिया भर के सेंट्रल बैंक क्यों जमा कर रहे हैं सोना? भारत की रणनीति पर उठे सवाल

Gold Reserves: दुनिया में बढ़ती राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता के बीच अब एक बड़ा बदलाव साफ दिखने लगा है। दुनिया के कई देशों के सेंट्रल बैंक चुपचाप अपने गोल्ड रिज़र्व बढ़ा रहे हैं। आम लोगों की नजर जहां सोने की बढ़ती कीमतों पर है, वहीं सरकारें और केंद्रीय बैंक इसे आर्थिक सुरक्षा और भविष्य के जोखिमों से बचाव के तौर पर देख रहे हैं।

रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, वैश्विक मंदी की आशंका और डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिशों ने सोने की अहमियत और बढ़ा दी है। यही वजह है कि हाल के वर्षों में सेंट्रल बैंकों ने रिकॉर्ड मात्रा में सोना खरीदा है।

गोल्ड रिज़र्व(Gold Reserve) क्या होता है?

गोल्ड रिज़र्व उस सोने को कहा जाता है, जिसे किसी देश का केंद्रीय बैंक अपने पास सुरक्षित रखता है। इसका इस्तेमाल संकट के समय देश की मुद्रा को संभालने, आर्थिक भरोसा बनाए रखने और अंतरराष्ट्रीय दबाव से निपटने में किया जाता है। यही कारण है कि सोना आज भी सबसे भरोसेमंद संपत्ति माना जाता है।

किस देश के पास सबसे ज्यादा सोना?

World Gold Council के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका के पास दुनिया का सबसे बड़ा गोल्ड रिज़र्व है, करीब 8,100 टन। इसके बाद जर्मनी, इटली और फ्रांस का नंबर आता है। रूस और चीन ने पिछले एक दशक में तेजी से सोना खरीदा है और अब दोनों के पास करीब 2,300 टन के आसपास भंडार है।

भारत की बात करें तो भारतीय रिज़र्व बैंक के पास लगभग 800 से 900 टन सोना है। इसी के साथ भारत दुनिया के टॉप-10 गोल्ड रिज़र्व वाले देशों में शामिल है, लेकिन अपनी बड़ी आबादी और भारी खपत के मुकाबले यह भंडार अभी भी सीमित माना जाता है।

हाल के सालों में सोने की भारी खरीद

2022 और 2023 में सेंट्रल बैंकों ने एक हजार टन से ज्यादा सोना खरीदा, जो अब तक का रिकॉर्ड है। रूस ने पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद डॉलर से दूरी बनाने के लिए सोने पर भरोसा बढ़ाया। वहीं चीन भी धीरे-धीरे अमेरिकी बॉन्ड से हटकर सोने की तरफ बढ़ता दिख रहा है।

सोने की कीमतों में उछाल की तीन बड़ी वजहें हैं—

पहली, युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव।

दूसरी, महंगाई और मंदी का डर।

तीसरी, खुद सेंट्रल बैंकों की भारी खरीद।

इन कारणों से निवेशक और देश दोनों सोने को सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं।

भारत के सामने क्या चुनौती?

भारत में सोने का सांस्कृतिक महत्व बहुत ज्यादा है। शादियों और त्योहारों में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है। लेकिन भारत सोने का बड़ा आयातक है, जिससे महंगाई बढ़ने पर आयात बिल भी बढ़ जाता है और रुपये पर दबाव आता है।

इसी वजह से सरकार गोल्ड बॉन्ड, गोल्ड ETF और हॉलमार्किंग जैसी योजनाओं को बढ़ावा दे रही है, ताकि लोग फिजिकल सोने की जगह फाइनेंशियल गोल्ड में निवेश करें।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक तनाव ऐसे ही बना रहा तो सेंट्रल बैंक सोना खरीदते रहेंगे और कीमतों पर दबाव ऊपर की ओर रहेगा। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अपनी सांस्कृतिक जरूरत और आर्थिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए।

आज सोना सिर्फ गहना नहीं रहा, बल्कि आर्थिक ढाल और भू-राजनीतिक हथियार बन चुका है। अमेरिका, चीन और रूस जहां तेजी से अपनी तिजोरियां भर रहे हैं, वहीं भारत को भी अपनी गोल्ड रिज़र्व नीति पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

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