उपराष्ट्रपति धनखड़ का बड़ा बयान: “न्यायपालिका कानून बना रही, कार्यपालिका का काम कर रही और सुपर संसद बन गई है”

देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने हाल ही में न्यायपालिका की भूमिका और पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि आज देश ऐसी स्थिति में पहुंच गया है जहां न्यायपालिका न सिर्फ कानून बना रही है, बल्कि कार्यपालिका और संसद की भूमिका भी निभा रही है।
धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति को बिल पास करने के लिए समयसीमा तय करने पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा, “राष्ट्रपति को निर्देश देना संविधान की आत्मा के खिलाफ है।” उन्होंने ये बातें राज्यसभा के प्रशिक्षु अधिकारियों को उपराष्ट्रपति एन्क्लेव में संबोधित करते हुए कहीं।
एक जज के घर पर हुई घटना और एफआईआर न होने पर सवाल
धनखड़ ने हाल ही में दिल्ली में एक जज के घर पर हुई घटना का जिक्र करते हुए कहा कि उस मामले में 7 दिन तक कोई जानकारी सामने नहीं आई और न ही कोई एफआईआर दर्ज हुई। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर किसी आम नागरिक के साथ ऐसा होता तो क्या ऐसा ही होता? उन्होंने कहा, “क्या कानून से परे एक वर्ग को विशेष छूट मिलनी चाहिए?”
उपराष्ट्रपति ने कहा कि अनुच्छेद 142 का उपयोग अब लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दरकिनार करने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह की न्यायिक सक्रियता संविधान के संतुलन को बिगाड़ सकती है।
धनखड़ ने यह भी कहा कि किसी भी मामले की जांच कार्यपालिका का कार्यक्षेत्र है, न कि न्यायपालिका का। उन्होंने जजों की एक आंतरिक समिति द्वारा चल रही जांच पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसी समितियों की कोई कानूनी मंजूरी नहीं होती और संसद ही अंतिम फैसला लेने का अधिकार रखती है।
धनखड़ ने साफ कहा कि देश ने ऐसा लोकतंत्र नहीं चुना था जहां जज कानून बनाएं, खुद फैसले लें और किसी के प्रति जवाबदेह न हों। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति का पद सर्वोच्च है और उन्हें निर्देश देना संविधान के मूल भाव के खिलाफ है।





