कांशीराम: दलितों के मसीहा बनने की कहानी

कांशीराम का नाम आज भी दलित राजनीति के संदर्भ में लिया जाता है। 15 मार्च 1934 को पंजाब के रूपनगर में जन्मे कांशीराम ने दलितों और शोषित वर्ग के लिए अपनी पूरी जिंदगी समर्पित कर दी। उनकी राजनीति और संघर्ष की शुरुआत महाराष्ट्र से हुई थी, जहां वे पुणे की गोला-बारूद फैक्ट्री में क्लास वन अफसर के तौर पर काम कर रहे थे।
यहां पर एक घटना घटी जिसने कांशीराम को समाज के शोषित वर्ग के लिए आवाज उठाने की प्रेरणा दी। एक दिन एक अफसर ने आंबेडकर जयंती के दिन छुट्टी देने से मना कर दिया, जिसके खिलाफ कांशीराम ने संघर्ष किया। इस दौरान कांशीराम ने न केवल अफसर की पिटाई की, बल्कि शोषण के खिलाफ एक बड़ा कदम उठाया। यह घटना उनके जीवन का मोड़ साबित हुई, और उन्होंने अपने कार्यक्षेत्र से इस्तीफा देकर एससी/एसटी वेलफेयर एसोसिएशन से जुड़ने का निर्णय लिया।
इसके बाद कांशीराम ने एक संगठन की आवश्यकता महसूस की जो सिर्फ दलितों के लिए नहीं, बल्कि ओबीसी, अल्पसंख्यकों और शोषित वर्ग के लिए काम करे। 6 दिसंबर 1978 को उन्होंने ‘बैकवर्ड एंड माइनोरिटी कम्युनिटीज एम्प्लाइज एसोसिएशन’ (BAMSEF) की स्थापना की, जो उनके आंदोलन की दिशा तय करने वाला कदम था।
साल 1981 में कांशीराम ने ‘दलित शोषित समाज संघर्ष समिति’ (DS4) का गठन किया और 1983 में एक साइकिल रैली आयोजित की, जिसमें लाखों लोग शामिल हुए। इसके बाद कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी (BSP) की स्थापना की, जो दलितों, पिछड़ों और अन्य वंचित समुदायों का एक मजबूत राजनीतिक मंच बना।
कांशीराम की कोशिशों के बाद 1995 में मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं, जो उनके संघर्ष का प्रतीक बन गईं। हालांकि, कांशीराम के निधन के बाद मायावती ने उनके विचारों को पूरी तरह से आगे नहीं बढ़ाया। फिर भी, कांशीराम का नाम दलित राजनीति के सबसे बड़े नायक के तौर पर हमेशा याद किया जाएगा।





