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वो शांति समझौता जिसमें 1200 भारतीय जवान शहीद हुए, पूर्व PM राजीव गांधी पर हमला हुआ

बीती सदी के आठवें दशक में पड़ोसी देश श्रीलंका को गृह युद्ध की लपटों से बाहर निकालने की कोशिश में भारत के हाथ जले थे. वहां भारतीय सेना को भेजने का निर्णय विनाशकारी साबित हुआ था. इस अभियान में इंडियन पीस कीपिंग फोर्स के लगभग बारह सौ जवानों का बलिदान हुए. समझौते के अगले ही दिन श्रीलंका की धरती पर गार्ड ऑफ ऑनर के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर एक श्रीलंकाई सैनिक ने राइफल के बट से हमला किया. आने वाले दिनों में राजीव गांधी ने अपनी जान देकर श्रीलंका में भारतीय सेना को भेजने और वहां की सरकार से समझौते की दुखद कीमत चुकाई थी.

आठवें दशक की शुरुआत से ही श्रीलंका जातीय हिंसा का सामना कर रहा था. वहां की सिंहली बहुमत-वर्चस्व की सरकार से अल्पसंख्यक तामिल आबादी को अपनी उपेक्षा और शोषण की जबरदस्त शिकायत थी. उन्होंने श्रीलंका के उत्तर और पूर्वी हिस्से में पूर्ण स्वायत्तता वाले “तामिल ईलम” के लिए सशस्त्र आंदोलन छेड़ रखा था. दिनों दिन मजबूत होते लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तामिल ईलम (एल टी टी ई) ने स्वतंत्र तामिल देश की बात भी शुरू कर दी थी.

इस परिकल्पना में श्रीलंका के तामिल आबादी वाले इलाकों के साथ ही भारत की तामिल आबादी का भूभाग भी शामिल था. श्रीलंका की बिगड़ती स्थिति के बीच भारत दोहरी चुनौती का सामना कर रहा था. एक ओर वहां अन्य विदेशी ताकतों के मजबूत होने से भारत के लिए खतरा बढ़ रहा था. दूसरी ओर भारत की तामिल आबादी के बीच श्रीलंका की घटनाओं को लेकर नाराजगी चरम पर थी. असलियत में वहां की सरकार और श्रीलंकाई तामिलों के बीच का संघर्ष भारत की एकता -अखंडता के लिए खतरा पैदा कर रहा था.

तामिल उग्रवादियों को भारत के समर्थन का आरोप

तामिल आबादी को इस मसले में भारत सरकार की चुप्पी पर ऐतराज था तो दूसरी ओर श्रीलंका की सरकार की शिकायत थी कि उसके यहां अलगाववादी तामिल ताकतों को भारत से सहायता और संरक्षण प्राप्त हो रहा है. नवंबर 1986 में बेंगलुरू में आयोजित सार्क सम्मेलन में श्रीलंका के राष्ट्रपति जे.आर.जयवर्धने ने अपने भाषण में इसे सार्वजनिक करके भारत के सामने मुश्किल पैदा कर दी.

जयवर्धने के इस भाषण की प्रति उनके बोलने के पूर्व ही भारत के राजनयिकों के हाथ लग गई थी. उनसे आग्रह किया गया कि अपने भाषण में कृपया इसका जिक्र न करें. उन्होंने आश्वस्त भी किया था. ऐसे मंचों पर द्विपक्षीय विवादों को न उठाने की परम्परा भी है. लेकिन बोलते समय जयवर्धने ने इन सबको दरकिनार किया और कहा कि गांधी-नेहरू की धरती पर वे अपने स्वागत से अभिभूत हैं और आज वे जो भी बोलेंगे उसे दिल से बोलेंगे. आगे जयवर्धने ने भारत पर श्रीलंका के तामिल उग्रवादियों को सहायता संरक्षण का आरोप लगाते हुए पंचशील संधि की याद दिलाई जो अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की प्रतिबद्धता बताती है.

प्रभाकरन को फांसी के लिए सौंपो

प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जयवर्धने के इस आरोप पर मंच से तत्काल उत्तर देने के स्थान पर खामोशी अख्तियार की. तत्काल ही उन्होंने अपने दो मंत्रियों पी.चिदंबरम और कुंवर नटवर सिंह को बेंगलुरु में ही मौजूद तामिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.जी.रामचंद्रन के पास भेजा. एम.जी. अपने साथ लिट्टे प्रमुख वी. प्रभाकरन को भी लाए थे. नटवर सिंह के मुताबिक एम.जी. के साथ मौजूद प्रभाकरन पृथक तामिल राज्य की मांग पर अड़ा रहा. एक मौके पर नटवर सिंह ने उसे यह कहते हुए भी सचेत किया कि कोई ऐसी स्थिति भी आ सकती है, जब उसे श्रीलंका और भारत की संयुक्त सेना का सामना करना पड़े. उसका जवाब था कि ईलम के लिए तामिल कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं.

हालांकि, प्रभाकरन की बेंगलुरु में मौजूदगी को भारत ने भरसक गोपनीय रखने की कोशिश की लेकिन जयवर्धने को इसका पता चल गया. उन्होंने राजीव गांधी से कहा, “राजीव, उसे मुझे सौंपो. मैं उसे जाफना में फांसी पर लटकाऊंगा, जहां उसने तामिल मेयर की गोली मारकर हत्या की है.”

श्रीलंका को लेकर राजीव थे बहुत जल्दी में

राजीव गांधी ने जयवर्धने को आश्वस्त किया कि भारत श्रीलंका की अखंडता, संप्रभुता का सम्मान करता है. वह स्वतंत्र ईलम का समर्थन नहीं करता लेकिन वहां की तामिल आबादी की समस्याओं का समाधान और उनकी इच्छाओं का आदर जरूरी है. राजीव गांधी मंत्रिमंडल में विदेश राज्यमंत्री रहे कुंवर नटवर सिंह ने अपनी किताब One Life Is Not Enough में लिखा है कि श्रीलंका की जातीय समस्या के निपटारे के लिए राजीव गांधी बहुत जल्दी में थे. शायद इसकी वजह पंजाब और असम संकट के निपटारे में मिली सफलता के चलते उनका बढ़ा आत्मविश्वास था.

नटवर सिंह के मुताबिक, राजीव गांधी ने जयवर्धने से इस सिलसिले में कई मुलाकातें कीं. नटवर सिंह का आकलन था कि श्रीलंका की जातीय समस्या के इतिहास से राजीव गांधी बहुत परिचित नहीं थे. नटवर के मुताबिक, “ऐसे बारीक मसलों में बातचीत से प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति को बचना चाहिए. क्योंकि न तो उनके पास इतना वक्त होता है और न ही विशेषज्ञता.”

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लिट्टे प्रमुख वी. प्रभाकरन

नौकाएं रोकीं तो हवाई रास्ते से मदद भेजी

श्रीलंका में बढ़ती अशांति के बीच भारत-श्रीलंका के प्रतिनिधियों के बीच मुलाकातों का सिलसिला जारी रहा. नटवर के अनुसार, इस समस्या को लेकर राजीव गांधी के सलाहकार-वार्ताकार तेजी से बदलते रहे. इस बीच तामिल इलाकों पर श्रीलंका सेना के बढ़ते प्रहारों और दबाव के बीच भारत सरकार ने वहां के लिए मानवीय सहायता की पेशकश की. समुद्री रास्ते से भेजी गई सामग्री को श्रीलंका ने नौकाएं रोक कर वापस भेज दिया. फिर भारत ने फाइटर विमानों के संरक्षण में हवाई रास्ते से प्रभावित इलाकों में सहायता सामग्री गिराई. भारत की स्पष्ट चेतावनी थी कि इन्हें रोके जाने का मतलब युद्ध को निमंत्रण होगा. श्रीलंका को भारत के इस कदम पर सख्त ऐतराज था और उसने अपनी नाराजगी जाहिर की.

क्या था वो समझौता ?

इस बीच दोनों देशों के प्रतिनिधियों की मुलाकातों में समझौते के एक ड्राफ्ट पर सहमति बनी. हालांकि इस बातचीत में श्रीलंका के तामिल उग्रवादी सीधे तौर पर शामिल नहीं थे लेकिन नटवर सिंह के अनुसार राजीव गांधी ने उन्हें बताया था कि प्रभाकरन ने समझौते शर्तों के प्रति उन्हें आश्वस्त किया है. इस ड्राफ्ट के अनुसार श्रीलंका प्रांतों को सत्ता का हस्तांतरण करेगा.

उत्तरी-पूर्वी प्रांतों का जनमत संग्रह के अधीन विलय होगा और तामिल भाषा को आधिकारिक दर्जा प्राप्त होगा. श्रीलंका की सेना उत्तरी प्रायद्वीप में आपरेशन बंद कर बैरकों में वापस होगी. तामिल उग्रवादी हथियार समर्पित करेंगे. भारत अलगाववादी ताकतों को समर्थन नहीं देगा और श्रीलंका की एकता-अखंडता के लिए सैन्य सहायता के लिए प्रतिबद्ध रहेगा.

कोलंबो में समझौते का व्यापक विरोध

भारत चाहता था कि 26 जुलाई 1987 को कोलंबो में दोनों देशों की ओर से इस पर हस्ताक्षर किए जाएं. फिर श्रीलंका की पेशकश पर 29 जुलाई की तारीख तय हुई. लेकिन श्रीलंका में समझौते को लेकर जबरदस्त नाराजगी थी. सुबह दस बजे प्रधानमंत्री राजीव गांधी सहित भारतीय दल कोलंबो हवाई अड्डे पर उतरा. स्वागत करने वाले मंत्री ने बताया कि सड़क मार्ग से उनका शहर में प्रवेश संभव नहीं होगा, क्योंकि हजारों लोगों ने रास्ते जाम कर रखे हैं. जगह-जगह आगजनी हुई थी.

राष्ट्रपति जयवर्धने की निजी संपत्तियां भी आग के हवाले कर दी गईं. प्रधानमंत्री प्रेमदासा,तमाम मंत्री और श्रीमावो भंडारनायके सहित समूचा विपक्ष विरोध में शामिल था. राजीव गांधी और उनके दल को हेलीकॉप्टरों से शहर ले जाया गया, जहां सन्नाटा और तनाव पसरा हुआ था.

सेना भेजने का राजीव ने अकेले लिया निर्णय

प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सम्मान में राष्ट्रपति जयवर्धने द्वारा आयोजित लंच में भी बहुत मामूली उपस्थिति रही. दोपहर तीन बजे समझौते पर हस्ताक्षर हुए. विदेश मंत्री पी.वी. नरसिंहराव और नटवर सिंह वहां मौजूद किसी श्रीलंकाई राजनेता से बात कर रहे थे. राव ने देखा कि राजीव गांधी और राष्ट्रपति जयवर्धने अन्य अधिकारियों से बातचीत में काफी गंभीर हैं. राव ने नटवर सिंह से पता लगाने को कहा. नटवर ने राजीव गांधी के पास पहुंचकर जानकारी चाही.

राजीव गांधी ने बताया कि राष्ट्रपति का कहना है कि श्रीलंका की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए अगर तुरंत भारतीय सेना यहां सहायता के लिए नहीं पहुंचती तो आज रात ही उनकी सरकार का तख्ता पलट हो सकता है. नटवर सिंह ने राजीव गांधी से कहा कि ऐसे गंभीर मसले में अपने वरिष्ठ कैबिनेट सहयोगियों से दिल्ली वापसी में मंत्रणा के बाद ही कोई फैसला लेना उचित होगा. अगले क्षण नटवर सिंह यह जान कर चकित रह गए कि राजीव गांधी तुरंत भारतीय सेना के श्रीलंका कूच का आदेश पहले ही दे चुके हैं. यह जानकारी मिलने पर नरसिंह राव भी काफी परेशान हुए लेकिन अपने स्वभाव के अनुसार उन्होंने राजीव गांधी से कुछ कहना मुनासिब नहीं समझा.

आगे अंधेरा ही अंधेरा

अगला दिन और बुरा साबित हुआ. 30 जुलाई को गार्ड ऑफ ऑनर के दौरान श्रीलंकाई नौसैनिक विजिथा रोहन विजेमुनि ने राइफल के बट से प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर हमला कर दिया. बेशक राजीव गांधी किसी गंभीर चोट के शिकार नहीं हुए लेकिन भारत-श्रीलंका समझौते के प्रति श्रीलंका की बहुसंख्य आबादी के रोष का संदेश दूर तक पहुंच गया. इसने आने वाले दिनों की उम्मीदों पर भी तुषारापात कर दिया. अगस्त महीने में श्रीलंका की धरती पर इंडियन पीस कीपिंग फोर्स पहुंची. भारत चीफ ऑफ आर्मी स्टॉफ दो हफ्ते के भीतर वहां शांति स्थापना का भ्रम पाले हुए थे.

असलियत में भारतीय सैनिकों को जाफना की भौगोलिक स्थितियों और लिट्टे उग्रवादियों के छिपने के ठिकानों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. भारतीय सेना को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी. उसके लगभग बारह सौ सैनिकों का बलिदान हुआ. 1990 में वीपी सिंह की सरकार के समय अंतिम तौर पर भारतीय सेना की श्रीलंका की सेना की वापसी हुई. राजीव गांधी अब सत्ता में नहीं थे. लेकिन वे लिट्टे के उग्रवादियों के निशाने पर थे. इन्हीं उग्रवादियों ने श्रीपेरंबदूर में 21 मई 1991 उनकी जान ले ली.

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