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बाबरी विध्वंस से राम मंदिर निर्माण तक 33 साल की पूरी कहानी, 6 दिसंबर 1992 का दिन जिसने बदल दिया देश का माहौल

दिल्ली। 6 दिसंबर 1992 भारतीय इतिहास का वह दिन जिसने देश की राजनीति, समाज और सामुदायिक रिश्तों को गहराई तक प्रभावित किया। अ

योध्या में 460 साल पुरानी बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना किसी एक ढांचे का गिरना नहीं था, बल्कि यह दशकों से हो रहे धार्मिक और राजनीतिक तनाव का विस्फोट था। सुबह करीब 10:30 बजे लाखों कारसेवक अयोध्या में इकट्ठा हुए। ‘जय श्री राम’ के नारों के बीच भीड़ उग्र हुई और थोड़े ही समय में मस्जिद की संरचनाओं को तोड़ना शुरू कर दिया। पांच घंटों में ढांचा पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया।

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह द्वारा पुलिस को गोली न चलाने के आदेश ने भीड़ को रोकने की कोशिशों को कमजोर किया। यह घटना अचानक नहीं थी 1990 से ही कारसेवा आंदोलन चरम पर था, और कई राजनीतिक दलों ने इसे अपनी-अपनी तरह से हवा दी थी।

विध्वंस के बाद देश भर में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। मुंबई सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। 1992-93 के दंगों में 900 से अधिक लोगों की मौत हुई, और जनवरी 1993 में हुए बम धमाकों ने शहर को दहला दिया। इसके बाद कई वर्षों तक देशभर में पाकिस्तान समर्थित आतंकी घटनाएं होती रहीं संसद हमला (2001), मुंबई ट्रेन ब्लास्ट (2006), 26/11 मुंबई हमला (2008), पुणे जर्मन बेकरी ब्लास्ट (2010) और पुलवामा (2019) जैसे हमलों में भारत ने सैकड़ों नागरिक और जवान खोए।

12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए सीरियल ब्लास्ट ने आतंकवाद की परिभाषा बदल दी। दाऊद इब्राहिम और उसकी डी-कंपनी इस हमले के पीछे थी, जिसने भारत को दशकों तक आतंकवाद से जूझने पर मजबूर कर दिया।

लंबी राजनीतिक, कानूनी और सामाजिक जद्दोजहद के बाद 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने विवादित भूमि पर राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया। और 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण पूरा हुआ वह अध्याय जिसने 33 वर्षों की उथल-पुथल भरी यात्रा को एक नई दिशा दी।

22 जनवरी 2024: अंत की शुरुआत

500 सालों की लंबी लड़ाई और बाबरी विध्वंस के 33 सालों बाद 100 करोड़ से ज्यादा हिंदुओं की मनोकामनाएं 22 जनवरी 2024 को केंद्र की मोदी सरकार के कार्यकाल में पूरी हुई। अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण पूरा हुआ और प्राण प्रतिष्ठा समारोह का आयोजन हुआ। दोपहर क़रीब 12 बजकर 30 मिनट पर भगवान राम की बाल स्वरूप मूर्ति को गृभगृह में स्थापित किया गया।

मुस्लिम पक्षकार क्यों सुप्रीम कोर्ट में कमजोर पड़े

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के अध्यक्षता में यह फैसला 5-0 से आया। इस कड़वे फैसले मुस्लिम पक्षकारों को मानना पड़ा। क्योंकि वह कोर्ट में यह प्रमाणित करने में विफल रह गए कि 1992 से पहले 460 सालों तक मस्जिद वहीं खड़ी थी। ऐसा कोई भी क़ानूनी दस्तावेज पेश नहीं किया गया जो इस फैसले पर बड़ा प्रभाव डाल सके। मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में कोई भी ऐसे कानूनी दस्तावेजों को पेश नहीं किया जो ये साबित कर सकता था कि वो ज़मीन उन्हीं की है।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुआ कहा था कि ये मस्जिद हजारों साल पुरानी नहीं थी। हालांकि, यह एक वैध इन्फ्रास्ट्रक्चर थी। फिर भी मुस्लिम पक्ष की ओर से ऐसा कोई भी साक्ष्य पेश नहीं किया गया।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के ख़िलाफ़ मुस्लिम पक्ष इसलिए पुनर्विचार याचिका नहीं डाल सके क्योंकि जो फैसला तो वह पांच जजों की बेंच ने सुनाया था। पांच जजों की संवैधानिक पीठ सर्वसम्मत को कोई फैसला सुनाती है तो उसे चैलेंज नहीं किया जा सकता।

मुस्लिम पक्ष की ओर से जो एक नाम सबसे चर्चित रहा वह इकबाल अंसारी रहे। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद वह सार्वजनिक रूप से कहे उन्हें सर्वोच्च न्यायालय का फैसला मंजूर है।

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