हरित क्रांति के जनक नॉर्मन बोरलॉग की 111वीं जयंती 25 मार्च को, जानिए कौन हैं नॉर्मन बोरलॉग?

नई दिल्ली। हरित क्रांति के जनक नॉर्मन बोरलॉग का जन्म 25 मार्च साल 1914 को अमेरिका के आयोवा में एक किसान परिवार में हुआ था। नॉर्मन बोरलॉग ने 1930 के दशक में महामंदी के दौरान गरीबी और खाद्यान संकट को करीब से देखा, जिससे उनमें कृषि विज्ञान के जरिए किसानों की मदद करने की प्रेरणा जागृत हुई। उन्होंने मिनेसोटा विश्वविद्यालय में पादप जीव विज्ञान और वानिकी का अध्ययन किया और 1942 में पादप रोग विज्ञान में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की, जिसके बाद मैक्सिको जाकर गेंहू की खेती में सुधार के लिए काम किया।
बोरलॉग 1940 और 1950 के दशक में मेक्सिको में रॉकफेलर फाउंडेशन के तकनीकी सहायता कार्यक्रम में शामिल हुए, जहाँ उन्होंने गेहूं की पैदावार बढ़ाने के लिए शोध किया। इस दौरान उन्होंने बौने गेहूं की किस्मों का विकास किया, जो रोग-प्रतिरोधी और उच्च उपज वाली थीं। 1960 के दशक में भारत और पाकिस्तान में इन किस्मों को पेश किया, जिससे गेहूं का उत्पादन बढ़ा।
नॉर्मन बोरलॉग की तकनीकों ने अरबों लोगों को भुखमरी से बचाया, इसलिए उन्हें हरित क्रांति का जनक कहा जाता है। उनके जीवन का सबसे बड़ा सन्देश था कि विज्ञान और करुणा को साथ मिलकर काम करना चाहिए। 95 साल की उम्र में 12 सितंबर साल 2009 को उनका निधन हो गया। 1960 के दशक में, जब भारत पकिस्तान अकाल की कगार पर थे, तब बोरलॉग ने अपनी विकसित गेंहू की किस्में वहां पहुंचाई।
साल 1966 में भारत ने 18 हजार टन गेहूं के बीज मंगाए, जिससे देश में गेहूं की पैदावार तेजी से बढ़ने लगी। साल 1965 में जहां भारत में 1.2 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन हो रहा था, वही साल 1968 तक यह बढकर 1.7 करोड़ टन तक पहुंच गया। साल 2006 में भारत सरकार ने भी नॉर्मन बोरलॉग को कृषि क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान को देखते हुए उन्हें पद्म विभुषण से सम्मानित किया। 5 हजार से ज्यादा गेहूं की किस्मों पर रिसर्च करने वाले बोरलॉग की तकनीक से गेहूं की उपज में 200 से 300 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी हुई थी।
बता दें कि जब बोरलॉग मैक्सिको में काम कर रहे थे, तब वहां के किसान गेहूं की फसल से काफी परेशान थे। ऊंचे पौधों वाली गेहूं की पारंपरिक किस्में अधिक उपज देती थी, लेकिन हवा के झोंकों और भारी अनाज के कारण पौधें गिर जाते थे। इससे पैदावार घट जाती थी। बोरलॉग ने इस समस्या को हल करने के लिए एक नई रणनीति अपनाई। उन्होंने जापान की “नोरिन 10” नामक बौने पौधे वाली गेहूं की किस्म का अध्ययन किया और इसे उच्च उपज देने वाली किस्मों के साथ मिलाकर गेहूं की प्रजातियां विकसित की। ये किस्में ज्यादा उपज देती थी, और पौधे गिरते नहीं थे।
बोरलॉग विश्व खाद्य पुरुष्कार के संस्थापक थे। जनसंख्या वृद्धि और खाद्य उत्पादन के बीच संतुलन बनाने की दिशा में वे शुरू से ही काम करते रहे। मेक्सिको के ओब्रेगॉन शहर के बाहर उनके स्मारक पर 24 देशों के झंडे फहराए जाते हैं। मिनेसोटा विश्वविद्यालय में उनकी विरासत का सम्मान किया जाता है और उनके काम को जारी रखने के लिए प्रेरित किया जाता है।
नॉर्मन बोरलॉग नोबेल पुरस्कार विजेता एक ऐसे अमेरिकी कृषि विज्ञानी थे, जिन्हें हरित क्रांति का पिता माना जाता है। बोरलॉग उन पांच लोगों में से एक हैं, जिन्हें नोबेल शांति पुरस्कार, स्वतंत्रता का राष्ट्रपति पदक और कांग्रेस से गोल्ड मेडल प्रदान किया गया था। बोरलॉग ने भारत के हरित क्रांति के जनक एमएस स्वामीनाथन के साथ भी कृषि के क्षेत्रों में काम किया है। वे हमेशा किसानों की मदद करना चाहते थे।
नॉर्मन बोरलॉग को “मानवता के जनक” के रूप में भी जाना जाता है।” हरित क्रांति ” के नाम से प्रसिद्ध बोरलॉग ने कृषि प्रौद्योगिकी में प्रगति के लिए आधार तैयार करने में मदद की, जिससे विश्व में भूखमरी ख़त्म हुई। रोगग्रस्त और कम उत्पादन वाली फसलों से जूझ रहे गरीब किसानों की सहायता करने के लिए, बोरलॉग ने गेहूं की नई किस्मों के साथ प्रयोग किया, जिससे रोग प्रतिरोधी प्रजातियाँ तैयार हुईं जो कठोर जलवायु का सामना कर सकती थीं। उनके इस प्रयास से दुनियाभर में नई क्रांति ने जन्म लिया और गेहूं का उत्पादन लगातार बढ़ने लगा।





