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लिंगयाडीह आंदोलन को महिला कांग्रेस का समर्थन, 64वें दिन BJP सरकार पर शिल्पी तिवारी का तीखा हमला

बिलासपुर।न्यायधानी के लिंगयाडीह क्षेत्र में अपनी जमीन और हक की लड़ाई लड़ रहे स्थानीय निवासियों का जन आंदोलन आज 64वें दिन में प्रवेश कर गया। दो महीने से अधिक समय से शांतिपूर्ण तरीके से चल रहे इस आंदोलन के बावजूद शासन-प्रशासन की चुप्पी ने लोगों के आक्रोश को और बढ़ा दिया है। सरकार की लगातार अनदेखी के कारण यह आंदोलन अब एक स्थानीय विरोध नहीं, बल्कि बड़े सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष का रूप ले चुका है।

विधायक और प्रशासन की ‘गुमशुदगी’ पर सवाल

आंदोलन स्थल पर मौजूद बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों में इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि चुनाव के समय घर-घर पहुंचने वाले जनप्रतिनिधि आज संकट की घड़ी में नदारद हैं। आंदोलनकारियों ने सवाल उठाते हुए कहा-

“बेलतरा विधायक को क्या हमारी तकलीफें नजर नहीं आतीं? 64 दिनों से छोटे बच्चों और बुजुर्गों के साथ खुले आसमान के नीचे बैठे हैं, लेकिन न कोई जिम्मेदार अधिकारी आया, न ही संवाद की कोई पहल हुई। आखिर जनता की सुध लेने वाला कौन है?”

लोगों का आरोप है कि प्रशासन केवल फाइलों और कागजी कार्रवाई तक सीमित रह गया है और जमीनी हकीकत से पूरी तरह कट चुका है।

सामाजिक संगठनों का समर्थन, आंदोलन को नई धार

आंदोलन के 64वें दिन विभिन्न सामाजिक संगठनों और समाजसेवियों ने धरना स्थल पर पहुंचकर खुला समर्थन दिया। संगठनों ने चेतावनी दी कि यदि जल्द समाधान नहीं निकाला गया, तो आंदोलन को और व्यापक व उग्र रूप दिया जाएगा।

“सिर्फ गरीबों की बस्तियां ही क्यों?”-शिल्पी तिवारी का सरकार पर हमला

आंदोलन को उस समय बड़ी राजनीतिक मजबूती मिली जब छत्तीसगढ़ महिला कांग्रेस की प्रदेश महासचिव शिल्पी तिवारी धरना स्थल पर पहुंचीं। उन्होंने भाजपा सरकार पर सीधा प्रहार करते हुए कहा-

“यह सरकार गरीबों के घर उजाड़ने का अभियान चला रही है। क्या कभी किसी रसूखदार का तीन मंजिला मकान या मॉल टूटता है? नहीं। बुलडोजर सिर्फ गरीबों की बस्तियों पर ही चलता है। आपके नाम के पीछे अडानी-अंबानी नहीं लिखा है, इसलिए आपको निशाना बनाया जा रहा है।”

उन्होंने कहा कि घर उजाड़ने में पल भर लगता है, लेकिन उसे बसाने में पूरी जिंदगी लग जाती है। बस्तर और रायगढ़ की घटनाओं का हवाला देते हुए उन्होंने सरकार को खुले तौर पर गरीब-विरोधी बताया।

आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगें

आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया कि वे किसी भी कीमत पर अपने हक से पीछे नहीं हटेंगे। प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं—

  • लिंगयाडीह में 50 वर्षों से रह रहे परिवारों को बेदखल न किया जाए।
  • 19 मार्च 2025 को तोड़े गए मकान-दुकानों का तत्काल पुनर्वास किया जाए।
  • वर्ष 2019 में आबादी घोषित भूमि के तहत जमा प्रीमियम के आधार पर स्थायी पट्टा दिया जाए।
  • प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ दिया जाए।
  • सड़क और मार्ग निर्माण मोहल्लावासियों व जनप्रतिनिधियों की सहमति से किया जाए।
  • मास्टर प्लान के अनुसार भूमि को आबादी मानते हुए पट्टा प्रदान किया जाए।
  • मकान तोड़कर कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स व गार्डन बनाने संबंधी बयान वापस लिया जाए।
  • नाली के बाद 20 फीट अतिरिक्त तोड़फोड़ की धमकियों पर रोक लगे।
  • शाम के समय सब्जी बेचकर जीवनयापन करने वाले गरीबों को परेशान न किया जाए और जब्ती बंद हो।
  • आसपास के क्षेत्रों में भी तोड़फोड़ की कार्रवाई रोकी जाए तथा मुख्यमंत्री की घोषणा के अनुरूप वहीं पक्का आवास दिया जाए।

जनप्रतिनिधियों और समाजसेवियों का बढ़ता समर्थन

आंदोलन को मजबूती देने के लिए कई प्रमुख नेता और समाजसेवी धरना स्थल पर पहुंचे। इनमें प्रमुख रूप से श्रीमती यशोदा पाटिल, श्याम मूरत कौशिक, कुंती तिवारी, डॉ. रघु साहू, साखन दरवे, भोला राम साहू और प्रशांत मिश्रा शामिल रहे।

इसके अलावा श्रवण दास मानिकपुरी, चतुर सिंह यादव, सिद्धार्थ भारती, आदर्श सिद्धार्थ, दिनेश घोरे, डॉ. अशोक शर्मा, रूपेश साहू, ओंकार साहू, गोपी देवांगन, गोलू देवांगन और सलीम मेमन ने भी आंदोलनकारियों के साथ एकजुटता दिखाई।

मातृशक्ति बनी आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत

इस आंदोलन की सबसे मजबूत कड़ी स्थानीय महिलाएं बनकर उभरी हैं। रामबाई, राधा साहू, संतोषी यादव, कुंती प्रजापति, चमेली रजक, पिंकी देवांगन, अनिता पाटिल, उर्मिला पाटिल, रूपा सरकार, सरस्वती देवांगन, पुष्पा देवांगन और मरजीना बेगम सहित सैकड़ों महिलाएं लगातार धरने पर डटी हुई हैं।

महिलाओं ने साफ कहा कि 64 दिनों से संघर्ष जारी है, लेकिन न विधायक ने सुध ली और न ही प्रशासन ने कोई भरोसा दिया। उनकी दृढ़ मौजूदगी यह संकेत दे रही है कि लिंगयाडीह का आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है।

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