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‘वंदे मातरम्’ अनिवार्य करने पर विवाद: अरशद मदनी बोले– यह धार्मिक आज़ादी पर हमला

नई दिल्ली। केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्र गीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन को कुछ आधिकारिक कार्यक्रमों में अनिवार्य किए जाने के फैसले पर सियासी और धार्मिक हलकों में प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने इस निर्णय का विरोध करते हुए इसे “पक्षपाती और जबरदस्ती थोपा गया फैसला” बताया है।

‘संविधान की धारा 25 का उल्लंघन’

मौलाना मदनी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि वंदे मातरम् को सभी सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों और कॉलेजों में इसकी समस्त पंक्तियों के साथ अनिवार्य करना धार्मिक स्वतंत्रता पर खुला हमला है। उनका कहना है कि गीत की कुछ पंक्तियां बहुदेववादी आस्था से जुड़ी हैं, जो इस्लाम के एकेश्वरवाद के सिद्धांत से मेल नहीं खातीं।

उन्होंने कहा, “मुसलमान किसी को वंदे मातरम् गाने से नहीं रोकते, लेकिन उसे पढ़ने के लिए मजबूर करना संविधान की धारा 25 और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन है।”

मदनी ने यह भी आरोप लगाया कि इस फैसले के पीछे चुनावी राजनीति और सांप्रदायिक एजेंडा है, जिसका उद्देश्य जनता का ध्यान मूल मुद्दों से हटाना है।

‘मुसलमान सिर्फ अल्लाह की इबादत करता है’

उन्होंने कहा कि मातृभूमि से प्रेम नारों से नहीं, बल्कि चरित्र और बलिदान से साबित होता है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी भूमिका का जिक्र करते हुए कहा कि इस तरह के फैसले देश की एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर कर सकते हैं।

देवबंदी उलेमा की भी आपत्ति

देवबंदी उलेमा मौलाना कारी इसहाक गोरा ने भी इस फैसले की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि सरकार को इसे लागू करने से पहले धार्मिक संवेदनशीलता पर विचार करना चाहिए था। उनके अनुसार, “इस्लाम में किसी की पूजा नहीं होती और वंदे मातरम् के कुछ शब्द मुस्लिम समुदाय के लिए स्वीकार्य नहीं हैं।”

सरकार का आदेश क्या कहता है?

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को जारी आदेश में कहा था कि जब राष्ट्र गीत ‘वंदे मातरम्’ और राष्ट्र गान ‘जन गण मन’ एक साथ गाए या बजाए जाएं, तो पहले वंदे मातरम् के सभी 6 छंद (लगभग 3 मिनट 10 सेकंड) गाए जाएंगे।

प्रोटोकॉल के तहत राष्ट्रपति के आगमन, तिरंगा फहराने और राज्यपालों के भाषण जैसे आधिकारिक कार्यक्रमों में भी राष्ट्र गीत के सभी छंद गाए जाने का प्रावधान किया गया है।

इस मुद्दे पर देशभर में बहस जारी है, जहां एक पक्ष इसे राष्ट्रप्रेम से जोड़कर देख रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में उठा रहा है।

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