अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष पर उठा सवाल, हाई कोर्ट ने याचिका खारिज की – कहा, कानून में ऐसी कोई बाध्यता नहीं

दिल्ली हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (एनसीएम) के अध्यक्ष पद से जुड़ी एक याचिका को खारिज कर दिया है। इस याचिका में मांग की गई थी कि आयोग का अध्यक्ष सिर्फ मुस्लिम या सिख ही नहीं, बल्कि ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी जैसे अन्य अल्पसंख्यक समुदायों से भी नियुक्त किया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में ऐसी कोई शर्त नहीं है, इसलिए याचिकाकर्ता केंद्र सरकार से शिकायत कर सकता है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की खंडपीठ ने कहा कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 में यह प्रावधान नहीं किया गया है कि सभी अल्पसंख्यक समुदायों को आयोग में प्रतिनिधित्व देना अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा कि केवल यह नियम है कि अध्यक्ष समेत पांच सदस्य किसी अल्पसंख्यक समुदाय से होंगे, लेकिन यह निर्धारित नहीं किया गया है कि कौन-से समुदाय से अध्यक्ष होना चाहिए।
यह याचिका सलेक चंद जैन नामक व्यक्ति द्वारा जनहित याचिका (PIL) के रूप में दायर की गई थी। उन्होंने अदालत को बताया कि अब तक आयोग के 16 अध्यक्षों में से 14 मुस्लिम और 2 सिख रहे हैं, जबकि अन्य अल्पसंख्यक समुदायों से किसी को यह पद नहीं मिला। उनका कहना था कि इससे अन्य समुदायों के अधिकारों की अनदेखी हो रही है और यह प्रतिनिधित्व का असंतुलन दर्शाता है।
हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ता की मांग को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि इस तरह का निर्णय न्यायालय नहीं, बल्कि नीति-निर्माण के स्तर पर केंद्र सरकार को लेना चाहिए। अदालत ने याचिकाकर्ता को केंद्र के समक्ष अपनी बात रखने की अनुमति दी और कहा कि यदि कोई प्रतिनिधित्व दिया जाता है तो उस पर उचित विचार किया जाएगा।
इस निर्णय के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि याचिकाकर्ता आगे क्या कदम उठाते हैं और क्या केंद्र सरकार इस विषय पर कोई नीति-स्तरीय बदलाव करती है। अदालत के इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि कानून के तहत किसी विशेष अल्पसंख्यक समुदाय को वरीयता देने की कोई बाध्यता नहीं है।





