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बिहार में रिकॉर्ड वोटिंग पर सियासी हलचल, क्या तेजस्वी यादव के लिए बना शुभ संकेत?

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग ने सियासी हलचल तेज कर दी है। 18 जिलों की 121 सीटों पर करीब 65% मतदान के साथ यह संकेत मिल रहा है कि इस बार मतदाता पहले से कहीं अधिक सक्रिय हुए हैं। चुनाव आयोग भी इस जोश से उत्साहित है और दूसरे चरण में भी यही रुझान बनाए रखने की उम्मीद कर रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जब-जब बिहार में वोटिंग 60% से अधिक हुई है, तब-तब आरजेडी या उससे जुड़े दलों की सरकार बनी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इस बार तेजस्वी यादव के लिए भी इतिहास खुद को दोहराने जा रहा है?

पिछले चार दशकों के चुनावी आंकड़े बताते हैं कि 1985 के बाद सिर्फ तीन बार ही वोटिंग 60% से ऊपर गई—1990, 1995 और 2000 में—और तीनों बार सत्ता आरजेडी या जनता दल के पास गई। 1990 में 62.04% मतदान के बाद लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने। 1995 में 61.79% वोटिंग के साथ जनता दल ने फिर से बहुमत पाया, जबकि 2000 में राबड़ी देवी की अगुवाई में आरजेडी सत्ता में लौटी। इसके बाद 2005 में वोटिंग घटकर 46.50% रह गई और लालू-राबड़ी का युग समाप्त हो गया।

नीतीश कुमार के कार्यकाल में वोटिंग प्रतिशत कभी 60% को पार नहीं कर सका। 2010 में 52.73%, 2015 में 56.91% और 2020 में 57.29% मतदान हुआ। अब जबकि 2025 के पहले चरण में वोटिंग 65% के करीब पहुंच गई है, इसे तेजस्वी यादव के लिए शुभ संकेत माना जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अधिक मतदान आमतौर पर सत्ता-विरोधी लहर का संकेत होता है। अगर इतिहास दोहराया गया, तो दो दशकों से बिहार की राजनीति पर हावी नीतीश कुमार के दौर का अंत और तेजस्वी यादव की शुरुआत संभव है। हालांकि अभी अंतिम फैसला मतगणना के बाद ही तय होगा।

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