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अंबरनाथ नगर परिषद में सियासी समीकरण बदले, विरोधी दलों का साथ शिवसेना पर पड़ा भारी

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर अप्रत्याशित मोड़ देखने को मिला है। अंबरनाथ नगर परिषद के अध्यक्ष पद को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस एक साथ आ गईं। इस गठजोड़ में अजित पवार गुट की एनसीपी का समर्थन भी शामिल रहा, जिससे एकनाथ शिंदे की शिवसेना को सत्ता से दूर रहना पड़ा।

नगर परिषद के इस घटनाक्रम ने आगामी नगर निगम चुनावों से पहले सत्ताधारी गठबंधन के भीतर की खींचतान को उजागर कर दिया है। राज्य में कई नगर निकायों में सहयोगी दल अलग-अलग चुनावी रणनीति अपनाते नजर आ रहे हैं, जबकि कुछ बड़े शहरों में ही साझा लड़ाई देखने को मिल रही है।

अंबरनाथ नगर परिषद में शिवसेना सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन अध्यक्ष पद के चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस और एनसीपी के सहयोग से बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया। कुल सदस्यों की संख्या के लिहाज से यह गठबंधन निर्णायक साबित हुआ और भाजपा समर्थित उम्मीदवार को अध्यक्ष चुना गया।

अंबरनाथ ठाणे जिले में आता है, जिसे शिंदे गुट का गढ़ माना जाता है। ऐसे में यह चुनाव भाजपा और शिवसेना के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया था। भाजपा ने शिवसेना उम्मीदवार के खिलाफ अपना प्रत्याशी उतारा और विरोधी दलों के समर्थन से बाजी मार ली।

इस घटनाक्रम पर शिवसेना ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी नेताओं ने भाजपा-कांग्रेस के साथ आने को अवसरवादी करार देते हुए कहा कि वैचारिक रूप से एक-दूसरे के खिलाफ रहने वाली पार्टियां केवल सत्ता के लिए एकजुट हो गईं। शिवसेना का कहना है कि नगर परिषद में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद उसे सत्ता से बाहर कर दिया गया, जो जनादेश की अनदेखी है।

वहीं भाजपा नेताओं ने गठबंधन का बचाव करते हुए कहा कि यह कदम शहर के विकास को प्राथमिकता देते हुए उठाया गया है। उनका कहना है कि वैचारिक मतभेदों को अलग रखकर सभी दल अंबरनाथ के समग्र विकास के लिए साथ आए हैं और परिषद में स्थिर प्रशासन देना ही इस सहयोग का उद्देश्य है।

अंबरनाथ नगर परिषद का यह सियासी घटनाक्रम राज्य की राजनीति में बदलते समीकरणों और आने वाले चुनावों से पहले नए गठबंधनों के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

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