दिल्ली में क्लाउड सीडिंग से नहीं हुई बारिश, लेकिन क्यों राहत महसूस कर रही है बीजेपी सरकार?

दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए बीजेपी सरकार ने मंगलवार को कृत्रिम बारिश यानी क्लाउड सीडिंग का प्रयोग किया, लेकिन आसमान से एक बूंद पानी नहीं गिरा। नतीजतन, आम आदमी पार्टी ने इसे फर्जीवाड़ा बताते हुए सरकार पर हमला बोल दिया। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि क्लाउड सीडिंग कोई जादू नहीं होती, बल्कि एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें नतीजे आने में समय लगता है।
आईआईटी कानपुर की टीम ने मंगलवार दोपहर करीब 1:30 बजे उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के बुराड़ी, मयूर विहार और करोल बाग के ऊपर सिल्वर आयोडाइड का छिड़काव किया था। यह प्रयोग दोबारा शाम 3:30 से 4:15 बजे के बीच भी दोहराया गया। उद्देश्य था कि कृत्रिम बारिश से हवा में फैले प्रदूषण के कण नीचे आ जाएं और वायु गुणवत्ता सुधर सके।
मौसम विभाग ने साफ किया कि अगले हफ्ते तक दिल्ली में प्राकृतिक बारिश की संभावना नहीं है। पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने बताया कि सीडिंग के बाद बारिश होने में 15 मिनट से लेकर चार घंटे तक का समय लग सकता है, लेकिन उस दिन बादलों में नमी बेहद कम थी, जिससे बारिश की संभावना लगभग समाप्त हो गई।
दिल्ली सरकार ने पहले ही आईआईटी कानपुर के साथ 3 करोड़ रुपये की लागत से पांच ट्रायल के लिए समझौता किया था। अब सिरसा ने कहा है कि आने वाले दिनों में जब मौसम अनुकूल होगा, तब 9 से 10 और ट्रायल किए जाएंगे।
विशेषज्ञों का कहना है कि क्लाउड सीडिंग का असर तत्काल नहीं दिखता। इसमें सिल्वर आयोडाइड या कैल्शियम क्लोराइड जैसे तत्व बादलों में छोड़े जाते हैं ताकि उनमें संघनन बढ़े और वर्षा हो सके। 2018-19 में महाराष्ट्र के सोलापुर में किए गए प्रयोगों के नतीजे आने में दो साल लगे थे, और वहां औसतन 18 प्रतिशत अधिक बारिश हुई थी।
दिल्ली में फिलहाल नमी 15-20 प्रतिशत थी, जबकि सफल क्लाउड सीडिंग के लिए 50-60 प्रतिशत ह्यूमिडिटी आवश्यक मानी जाती है। ऐसे में यह प्रयास असफल भले रहा हो, लेकिन इसे एक वैज्ञानिक प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है। यही कारण है कि आम आदमी पार्टी के राजनीतिक हमलों के बावजूद बीजेपी सरकार फिलहाल राहत की सांस ले रही है कि प्रयोग ने भविष्य के लिए रास्ता जरूर खोला है।





