नौतपा और मानसून का बदला रिश्ता, ग्लोबल वार्मिंग ने बिगाड़ा मौसम का संतुलन

नौतपा और मानसून के बीच का पारंपरिक संबंध अब बदलता नजर आ रहा है। भारतीय मान्यताओं में माना जाता रहा है कि जेठ महीने में जितनी ज्यादा गर्मी पड़ेगी, उतनी ही अच्छी बारिश होगी। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग ने इस पुराने मौसम चक्र को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।
भारत में हर साल 25 मई से 2 जून के बीच पड़ने वाले नौतपा के दौरान सूर्य कर्क रेखा के आसपास सबसे अधिक प्रभाव डालता है। इन नौ दिनों में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और अन्य राज्यों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। परंपरागत रूप से किसान इन दिनों की तेज गर्मी को अच्छी मानसूनी बारिश का संकेत मानते रहे हैं।
भारतीय खगोल शास्त्र के अनुसार, जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब नौतपा की शुरुआत मानी जाती है। सदियों से यह धारणा रही है कि “जितना तपे जेठ, उतनी बरसे मेघ।” यही वजह है कि ग्रामीण और कृषि प्रधान क्षेत्रों में नौतपा को महत्वपूर्ण माना जाता है।
हालांकि अब मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि नौतपा और मानसून के पुराने समीकरण पर ग्लोबल वार्मिंग का असर पड़ रहा है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, वनों की कटाई और प्रदूषण ने प्राकृतिक मौसम चक्र को बदल दिया है। बहुमंजिला इमारतों, कंक्रीट और वाहन प्रदूषण के कारण धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ता स्तर धरती और सूर्य के बीच एक ऐसा आवरण बना रहा है, जो गर्मी को बाहर निकलने से रोकता है। इसी वजह से हीटवेव और अत्यधिक गर्मी की घटनाएं बढ़ रही हैं।
नौतपा और मानसून के संबंध को प्रभावित करने वाला एक बड़ा कारण अल नीनो प्रभाव भी है। अल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर की हवाएं गर्म हो जाती हैं, जिससे दक्षिण एशिया में बारिश कम हो सकती है। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक इस साल भी अल नीनो सक्रिय रहने की आशंका काफी अधिक है, जिसका असर मानसून और खरीफ फसलों पर पड़ सकता है।
इसके उलट ला नीना की स्थिति अच्छी बारिश के लिए अनुकूल मानी जाती है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मानसून की स्थिति सीधे खेती, डेयरी, जल संसाधन और महंगाई पर असर डालती है।
हालांकि राहत की बात यह है कि इस बार दक्षिण-पश्चिम मानसून केरल तट पर समय से पहले पहुंचने के संकेत मिल रहे हैं। मौसम विभाग का अनुमान है कि मानसून की शुरुआती गतिविधियां सामान्य रह सकती हैं, लेकिन आगे अल नीनो की सक्रियता स्थिति बदल सकती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरणीय नुकसान की रफ्तार नहीं रुकी, तो आने वाले समय में नौतपा और मानसून जैसे पारंपरिक मौसम संकेत पूरी तरह बदल सकते हैं।
