अनेक मान्याताओं से भरा है कुदरगढ़ पहाड़, पड़ोसी राज्यों से भी आते हैं श्रद्धालु

नई दिल्ली। सूरजपुर जिले का प्राचीन कुदरगढ़ धाम में मां बागेश्वरी का प्राचीन मंदिर अतीत हैं। इस प्राचीन कुदरगढ़ धाम का इतिहास भी काफी रोचक मान्यताओं से भरा है। मान्यता है कि इसी क्षेत्र में मां भगवती ने राक्षसों का संहार किया था। इस जगह की इसी विशेषता के कारण यहां ना सिर्फ आस-पास के जिलों से बल्कि पड़ोसी राज्यों से भी श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां आते हैं।
सूरजपुर जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर ओडगी विकासखंड में स्थित कूदरगढ़ धाम घने जंगल के बीच बसा है। यह स्थान दुर्लभ पेड़-पौधों, और झरनों से भरा हुआ है। यहाँ लंबे-लंबे घने साल के विशालकाय वृक्ष मौजूद है। इसी जंगल के बीच खुले स्थान पर वट वृक्ष के नीचे माता बागेश्वरी विराजमान हैं। कुदरगढ़ी माता धाम को शक्ति पीठ के नाम से भी जाना जाता हैं, जो लगभग 1500 फीट ऊंचे पहाड़ पर विराजमान है।
मान्यता के अनुसार कुदरगढ़ क्षेत्र मां भगवती पार्वती की तपस्थली रही हैं, जहां माता भगवती ने शक्ति का रूप धारणकर राक्षसों का संहार किया था। बाद में इसी जगह पर लगभग चार सौ साल पहले राजा बालंद ने माता बागेश्वरी को स्थापित किया। वे माता के भक्त थे। बाद में चौहान वंश के राजा ने बालंद को युद्ध में पराजित कर दिया था, जिसके बाद उसी वंश ने माता के मंदिर की देख रेख की। तब से हर साल नवरात्र में सुबह की पहली आरती चौहान वंश के वंशज ही यहां करते हैं।
राजा बालंद के द्वारा कुदरगढ़ धाम में माता बागेश्वरी की स्थापना के बाद कुछ चोर माता की मूर्ती को चोरी कर उठा ले गए। इसी दौरान चोरों ने मूर्ति को कुछ दूर ले जाकर रखा दिया। इसके बाद वे उस मूर्ति को उठा नहीं पाएं। यही कारण है कि वट वृक्ष के नीचे ही माता की मूर्ति स्थापित है। 18वीं सदी में चौहान राजाओं ने छत्तीसगढ़ के मूल आदिवासी बैगा जनजाति को माता की देख-रेख और पूजा पाठ की जिम्मेदारी सौंपी। तब से आज तक बैगा समुदाय के लोग ही माता कि पूजा करते है।
कुदरगढ़ देवी मंदिर एक पूजनीय आध्यात्मिक स्थल है, जो तीर्थयात्रियों और प्रकृति प्रेमियों को समान रूप से आकर्षित करता है। ऊंची पहाड़ी पर स्थित यह पवित्र मंदिर देवी कुदरगढ़ी को समर्पित है, जिन्हें दिव्य शक्ति का प्रतीक माना जाता है। मंदिर आध्यात्मिकता और प्राकृतिक सुंदरता का एक आदर्श मिश्रण प्रस्तुत करता है, जो इसे इस क्षेत्र में सबसे अधिक देखी जाने वाली जगहों में से एक बनाता है। मंदिर तक दो अलग-अलग रास्तों से पहुंचा जा सकता है, जो एक दिलचस्प यात्रा की ओर ले जाता है।
इनमें से एक रास्ता लगभग 1000 सीढ़ियों वाला है, जो आगंतुकों के लिए चुनौतीपूर्ण लेकिन फायदेमंद चढ़ाई प्रदान करता है। जैसे-जैसे आप चढ़ते हैं, आसपास की प्रकृति आपको अपने शांत आकर्षण से गले लगाती है। रास्ते में, आपको एक खूबसूरत झरना मिलेगा, जो एक ताज़ा वातावरण बनाता है, और एक शांत तालाब जो अनुभव की शांति को बढ़ाता है।
पानी, हरियाली और प्रकृति की ध्वनि का मिश्रण यात्रा को गंतव्य की तरह ही आकर्षक बनाता है। शीर्ष पर पहुँचने पर, मंदिर आगंतुकों का स्वागत एक शानदार मनोरम दृश्य के साथ करता है जो पवित्र स्थान और इसकी प्राकृतिक सुंदरता का सार को दर्शाता है। मंदिर परिसर सरल लेकिन आकर्षक है, जो प्रार्थना और ध्यान के लिए शांतिपूर्ण माहौल प्रदान करता है। पहाड़ियों और घाटियों के लुभावने दृश्यों से घिरा मंदिर का शांत वातावरण आपके दिल और आत्मा को मोहित कर देने वाला है।
कुदरगढ़ मंदिर अपने वार्षिक मेले के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसे कुदरगढ़ मेला के नाम से जाना जाता है, जिसमें पूरे क्षेत्र से हजारों श्रद्धालु आते हैं। मंदिर का महत्व आध्यात्मिक और सांस्कृतिक है, क्योंकि यह स्थानीय समुदायों के दिलों में एक प्रमुख स्थान रखता है। छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक सुंदरता को देखने के इच्छुक लोगों के लिए, कुदरगढ़ मंदिर आध्यात्मिक विश्राम और प्रकृति की शांति का संयोजन करने का एक आदर्श अवसर प्रदान करता है। पहाड़ी की चोटी से मनमोहक दृश्य और मंदिर का शांतिपूर्ण वातावरण इसे एकांत और दिव्य संबंध की तलाश करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए एक महत्वपूर्ण जगह बनाता है।
मंदिर ट्रस्ट की माने तो यह मंदिर काफी प्राचीन है। यहां लोगों में मां के प्रति आस्था साफ तौर पर देखी जाती है। कहा जाता है कि इस मंदिर में श्रद्धालु जो भी मन्नत मांगते हैं, वो पूरी हो जाती है। यही कारण है कि हमेशा यहां श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगा रहता है। नवरात्र के पावन पर्व पर इस मंदिर का ख़ास महत्त्व होता है। इस अवसर पर देशभर से श्रद्धालू माता का दर्शन करने यहां आते हैं। इस दौरान यहां मेले जैसा माहौल देखा जाता है।
कुदरगढ़ देवी मंदिर में जाने का सबसे अच्छा समय सर्दियों में यानी की अक्टूबर से फरवरी महीने के बीच का होता है, जब मौसम सुहावना होता है। वसंत ऋतु में वार्षिक कुदरगढ़ मेला भी का भव्य आयोजन भी होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। मंदिर का दरवाजा रोजाना सुबह 5 से शाम 7 बजे तक भक्तों के लिए खोला जाता हैं। छत्तीसगढ़ का ये पर्यटन क्षेत्र अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत, समृद्ध इतिहास और लुभावनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है।
यहां कई जनजातियों का घर है, जिनके अलग-अलग रीति-रिवाज, नृत्य और त्यौहार हैं, जो इसे प्रामाणिक भारतीय संस्कृति का अनुभव करने वालों के लिए एक आदर्श गंतव्य बनाता है। प्राचीन मंदिरों से लेकर आदिवासी कला तक यहां का हर कोना अपने आकर्षक अतीत की कहानी कहता है।





