जानिए छ.ग. में कहां कराई जाती है काठ और आम पेड़ की शादी?

यूं तो भारत देश का प्राचीन इतिहास, संस्कृति, रीतिरिवाज और परंपरा दुनिया भर में प्रसिद्ध है। वही छत्तीसगढ़ में कई पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक मान्यता और संस्कृति भी देशभर में प्रचलित है। आज हम बात करेंगे छत्तीसगढ़ से जुड़ी एक ऐसी ही अजीबोगरीब परंपरा की, जिसमें काठ और आम के पेड़ की पूरे रीती-रिवाजों के अनुसार शादी कराई जाती है। जी हां ये चौंकाने वाली बात है, लेकिन सच है।
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में सदियों से काठ और आम के पेड़ की शादी की परंपरा आज भी धूमधाम से निभाई जाती है। मैनपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत तेतलखुटी में स्थित धरनीबहाल गांव में इसका भव्य आयोजन किया जाता है। यहां आम के बगीचों में आम वृक्ष की पूरी रीती रिवाजों के साथ विधि-विधान से विवाह का कार्यक्रम सम्पन्न कराया जाता है। यहां के निवासियों की मान्यता है कि इस तरह के आयोजन से पर्यावरण पूरी तरह से सुरक्षित हो जाती है और खेती करने वाले किसानों पर किसी तरह की आपदा नहीं आती।
इस अनोखे आयोजन में काठ को दूल्हा और आम के पेड़ को दुल्हन के रूप में सजाया जाता है। परंपरा के तहत पंडित मंत्रोच्चारण के साथ विवाह से जुडी सभी रस्मों को निभाते हुए शादी संपन्न कराते हैं। जिसमें सिंदूरदान और कन्यादान भी शामिल होता है। शादी के इस रस्म के बाद दोनों पक्ष के मेहमानों के लिए भोजन का इंतजाम किया जाता है। साथ ही गांव के लोगों को भी भोजन के लिए आमंत्रित किया जाता है।
पहली बार आम के पेड़ में फल लगने पर बगीचे के मालिक द्वारा ये आयोजन किया जाता है। इस दौरान कन्यादान भी किया जाता है और मंगलगीत भी गए जाते हैं। साथ ही सब मिलकर विवाह पंडाल के नीचे भोजन भी करते हैं। वही विवाह संपन्न होने के बाद ही बगीचों में लगे आम के फल को चखा जाता है। ऐसा माना जाता है कि आम के पेड़ में लगे फल को उसकी शादी कराने से पहले अगर तोडा जाता है, तो ये फसल के लिए नुकसानदायक साबित होता है।
परंपरा के मुताबिक आम के पेड़ के लिए काठ का दूल्हा तैयार किया जाता है। उसके बाद दूल्हे को उसकी दुल्हन यानी की फलदार पेड़ के पास रख दिया जाता है। महिलाएं मंगल गीत के साथ काठ के दूल्हे के शरीर पर हल्दी का लेप लगाती हैं और उसे दूल्हे के रूप में तैयार करती हैं। इसके बाद ग्रामीण पेड़ के आस-पास इकट्ठा होते है और फिर शुरू होती है काठ के बने दूल्हे और आम के पेड़ की शादी की रस्में।
बता दें इस अनोखी शादी में बाराती और घराती दोनों पक्ष शामिल होते हैं। पंडित को भी बुलाया जाता है और सात फेरे की रस्म भी होती है, जिसे पेड़ के मालिक और उसकी पत्नी द्वारा पूरे रीती-रिवाजों के साथ निभाया जाता है। वही शादी के बाद पेड़ पर लगे आम को तोड़कर चखा जाता है। इस दौरान पुरे गांव को शादी का नेवता दिया जाता है साथ ही उन्हें बैठकर भोजन भी कराया जाता है।
ग्रामीणों की माने तो ये परंपरा उनके पूर्वजों के समय से पारंपरिक तौर से चलते आ रहा है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों ने वृक्ष को धर्म से जोड़ा है। जैसे की पीपल और बरगद के पेड़ की पूजा की जाती हैं। ऐसी ही एक परंपरा है, जब नया बाग़ लगाते हैं, और उसका फल तब तक नहीं खाया जा सकता, जब तक उसकी पूजा-अर्चना और शादी नहीं होती। ऐसे में आम के पेड़ की शादी की ये अनोखी परंपरा अपने आप में एक अलग मान्यता को दर्शाती है।
बता दें इस विवाह का आयोजन हर साल बसंत ऋतु के आने और पेड़ पर आम की पहली फसल लगने पर किया जाता है। जिसका गवाह पूरा गांव बनता है। काठ और आम के पेड़ की शादी से प्रकृति खुश होती है, जिससे पर्यावरण और प्रकृति के बीच बेहतर तालमेल बना रहता है। साथ ही गांव की हर फसल खुशहाल होती है। वही शादी से पहले अगर पेड़ से फल तोडा गया, तो इसे पूरे गांव के लिए एक संकट माना जाता है।
छत्तीसगढ़ में तरह-तरह की जातियां और जनजातियां निवास करती है, जिनके द्वारा अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरह की परंपरा निभाई जाती है। काठ और आम पेड़ की शादी की परंपरा भी इन्ही रिवाजों में से एक है, जो अपने आप में एक चौंकाने वाली संस्कृति है। फिलहाल ग्रामीण हर साल इस तरह के भव्य शादी का आयोजन करते हैं और खुशियां मनाने हैं।





