भारत कुष्ठ रोग को हराने की कगार पर, जानिए कैसे जीती गई ये लंबी जंग

कुष्ठ रोग, जिसे हन्सेन डिज़ीज़ के नाम से भी जाना जाता है, माइकोबैक्टीरियम लेप्रे बैक्टीरिया के संक्रमण से फैलता है। इसके कारण शरीर पर धब्बे पड़ जाते हैं और प्रभावित हिस्सा सुन्न हो जाता है। मरीज को दर्द, गर्मी या ठंड का एहसास नहीं होता। हाथ-पैरों और चेहरे में टेढ़ापन आ सकता है और आंखों पर भी इसका असर पड़ता है।

भारत में 1951 की जनगणना के मुताबिक, हर 10 हजार लोगों पर 38 लोग कुष्ठ रोग से संक्रमित पाए गए थे। उस समय 13.74 लाख लोग इस बीमारी से पीड़ित थे। इसकी गंभीरता को देखते हुए सरकार ने इसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य समस्या घोषित किया और 1954-55 में राष्ट्रीय कुष्ठ नियंत्रण कार्यक्रम (NLCP) शुरू किया गया। इसके तहत घर-घर जाकर डैप्सोन मोनोथेरेपी से इलाज किया गया और 1969-74 में चौथी पंचवर्षीय योजना के दौरान शहर और गांव दोनों स्तरों पर कवरेज बढ़ाया गया।

1983 में सरकार ने NGOs की भागीदारी बढ़ाते हुए SET यानी सर्वे, शिक्षा और उपचार कार्यक्रम शुरू किया। इसके तहत हर 25 हजार की आबादी पर पैरामेडिकल कर्मचारी तैनात किए गए। लोगों को घर-घर जाकर संक्रमण के शुरुआती लक्षणों और उपचार की जानकारी दी गई। 1982-83 में मल्टी ड्रग थेरेपी (MDT) की शुरुआत हुई, जिसे WHO ने मान्यता दी थी। इसके तहत मरीजों को मुफ्त इलाज और सलाह दी जाने लगी।

इस व्यापक अभियान का असर भी दिखा। 1981 में कुष्ठ रोग की दर 57.2 प्रति 10,000 थी, जो 2004 तक घटकर 2.4 रह गई। गंभीर विकृति (ग्रेड II) की दर भी 20% से घटकर 1.5% रह गई। 2004 तक 17 राज्यों और 250 जिलों ने कुष्ठ रोग उन्मूलन का लक्ष्य हासिल कर लिया, जबकि 7 राज्य इसके करीब पहुंच गए। दिसंबर 2005 में भारत ने राष्ट्रीय स्तर पर कुष्ठ रोग को हराने का लक्ष्य हासिल किया।

वर्तमान में राष्ट्रीय कुष्ठ रोग उन्मूलन कार्यक्रम (NLEP) के तहत 2023-2027 के लिए नई रणनीतिक योजना और रोडमैप तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य 2030 तक कुष्ठ रोग के प्रसार को पूरी तरह रोकना है। इस दिशा में वैश्विक कुष्ठ रोग रणनीति 2021-2030 के तहत निगरानी, डिजिटलीकरण, वैक्सीन की शुरुआत और जागरूकता अभियानों पर जोर दिया जा रहा है ताकि आने वाले वर्षों में भारत पूरी तरह कुष्ठ रोग मुक्त बन सके।

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