केंद्रीय जेल निर्माण की आड़ में टूटते आशियाने, बैमा खपराखोल के ग्रामीण बेघर होने की कगार पर

बिलासपुर। जिले के ग्राम बैमा नंगोई के आश्रित गांव खपराखोल में इन दिनों दर्द, डर और बेबसी का माहौल है। प्रशासन की फाइलों में जिसे सिर्फ “केंद्रीय जेल का निर्माण” बताया जा रहा है, वही योजना सैकड़ों ग्रामीणों के लिए अपने घर, अपनी यादें और अपनी जड़ों से बिछड़ने का कारण बन गई है। जेल निर्माण के लिए गांव के पक्के मकानों को तोड़ने की तैयारी की जा रही है, जिससे ग्रामीणों का आशियाना उजड़ने वाला है।

ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने जीवन भर की कमाई, मेहनत और संघर्ष से अपने छोटे-छोटे घर बनाए थे। इन्हीं घरों में बच्चों का बचपन बीता, बेटियों की शादियां हुईं और बुजुर्गों ने अपनी पूरी उम्र गुजार दी। अब सरकारी आदेश के तहत इन मकानों को तोड़ा जा रहा है और बदले में सिर्फ गांव से दूर एक खाली जमीन देने की बात कही जा रही है। ग्रामीणों का दर्द है कि खाली जमीन पर घर कैसे बनेगा, इसके लिए न तो उनके पास पैसा है और न ही साधन।

गांव के बुजुर्गों की आंखों में आंसू हैं और युवाओं में भविष्य को लेकर गहरी चिंता। उनका कहना है कि जो किसान आज दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहा है, वह नई जगह पर ईंट-सीमेंट कहां से लाएगा। बिना घर के परिवार कैसे बसेगा, यह सवाल हर चेहरे पर साफ दिख रहा है।

पीड़ित ग्रामीणों की एक ही मांग है— “घर के बदले घर दो”। उनका कहना है कि यदि शासन को विकास के नाम पर उनके घर लेने हैं, तो उन्हें पक्का मकान बनाकर दिया जाए। सिर्फ जमीन देकर उन्हें बेसहारा छोड़ना अन्याय है। गांव की गलियों में आज सन्नाटा नहीं, बल्कि उजड़ने का डर और अपनों से बिछड़ने का दर्द गूंज रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि अगर उनकी मांग नहीं मानी गई, तो आने वाले दिनों में कई परिवार बेघर होकर सड़कों पर भटकने को मजबूर हो जाएंगे। यह मामला सिर्फ जमीन अधिग्रहण का नहीं, बल्कि इंसानी जिंदगी, सम्मान और पुनर्वास से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है।

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