हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: नोट मिलने से ही साबित नहीं होती रिश्वत, आरोपी को बरी किया

रायपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि सिर्फ आरोपी के पास से पैसे मिल जाने का मतलब यह नहीं है कि उसने रिश्वत ली ही है। यह भी साबित होना जरूरी है कि उसने अपनी मर्जी से रिश्वत ली थी।

यह फैसला गरियाबंद जिले के एक मामले में सुनाया गया, जिसमें आदिम जाति कल्याण विभाग के कर्मचारी लवन सिंह चुरेंद्र पर रिश्वत लेने का आरोप लगा था। मदनपुर के सरकारी स्कूल के शिक्षक बैजनाथ नेताम ने एसीबी में शिकायत की थी कि चुरेंद्र ने हॉस्टल के बच्चों की स्कॉलरशिप स्वीकृत करने के लिए उससे 10 हजार रुपये रिश्वत मांगी थी। शिकायत के बाद एसीबी ने जाल बिछाकर चुरेंद्र के पास से 8 हजार रुपये बरामद किए और केस दर्ज कर लिया।

निचली अदालत ने आरोपी को दोषी मानते हुए दो-दो साल की सजा सुनाई थी। लेकिन आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील की। सुनवाई के दौरान उसने दलील दी कि शिकायतकर्ता खुद छात्रवृत्ति गबन के मामले में आरोपी था और उसी दुश्मनी में उसे झूठा फंसा दिया।

हाईकोर्ट में यह भी सामने आया कि आरोपी के पास स्कॉलरशिप पास करने का अधिकार ही नहीं था और रिकॉर्ड की गई बातचीत में भी रिश्वत मांगने की कोई पक्की बात सामने नहीं आई।

इन तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला आपसी दुश्मनी का भी हो सकता है और केवल नोट मिलने के आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

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