7 साल साथ रहने से माना गया क्रूरता का माफ होना, हाईकोर्ट ने तलाक रद्द किया

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में निचली अदालत द्वारा दिया गया तलाक का आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि पति ने पत्नी पर लगाए गए क्रूरता के आरोपों को पहले ही माफ कर दिया था, क्योंकि दोनों पति-पत्नी की तरह लगातार करीब सात साल तक साथ रहे थे।

हाईकोर्ट के अनुसार, पत्नी ने वर्ष 2008 में दहेज प्रताड़ना को लेकर पति के खिलाफ आईपीसी की धारा 498-ए के तहत मामला दर्ज कराया था। इस मामले में वर्ष 2009 में पति और उसके परिजन बरी हो गए थे। इसके बाद वर्ष 2010 से दिसंबर 2017 तक पति-पत्नी एक साथ रहकर वैवाहिक जीवन बिताते रहे। कोर्ट ने इसे इस बात का साफ संकेत माना कि पति ने पहले की कथित क्रूरता को स्वीकार कर माफ कर दिया था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि पति को पत्नी के किसी अन्य पुरुष से संबंध की जानकारी 2 अक्टूबर 2017 को थी, तो उसके बावजूद वह 17 दिसंबर 2017 तक पत्नी के साथ रहा। इससे यह साबित होता है कि इस आरोप को भी उसने उस समय स्वीकार कर लिया था।

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी संदेह जताया कि अवैध संबंध का आरोप तलाक याचिका में बाद में संशोधन के जरिए जोड़ा गया, जिससे उसकी विश्वसनीयता कमजोर हो जाती है।

पत्नी ने परिवार न्यायालय के उस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें 498-ए की एफआईआर और कथित अवैध संबंध को क्रूरता मानते हुए पति को तलाक दे दिया गया था। हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के आदेश को गलत ठहराते हुए कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1) के तहत इस मामले में तलाक का आधार बनता ही नहीं है।

मामले के अनुसार, पति-पत्नी का विवाह वर्ष 2003 में हुआ था। वर्ष 2017 में पत्नी के घर छोड़ने के बाद पति ने तलाक की कार्यवाही शुरू की थी। सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पत्नी की अपील स्वीकार की और तलाक का आदेश निरस्त कर दिया।

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