हजरतबल दरगाह विवाद: राष्ट्रीय प्रतीक का धार्मिक स्थलों पर इस्तेमाल कितना उचित?

श्रीनगर की पवित्र हजरतबल दरगाह में हाल ही में राष्ट्रीय प्रतीक अशोक चिह्न को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया। दरगाह के प्रार्थना हॉल में संगमरमर की प्लेट पर राष्ट्रीय प्रतीक उकेरा गया था, जिस पर कुछ लोगों ने आपत्ति जताई। इसे इस्लाम के खिलाफ बताते हुए प्रतीक को नष्ट कर दिया गया, जिससे तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई।
मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सवाल उठाया कि आखिर धार्मिक स्थलों पर राष्ट्रीय प्रतीक लगाने की आवश्यकता क्यों पड़ी। उन्होंने साफ कहा कि मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और दरगाहें धार्मिक स्थल हैं, न कि सरकारी दफ्तर। राष्ट्रीय प्रतीकों का इस्तेमाल केवल सरकारी आयोजनों और संस्थानों में होना चाहिए।
कानून भी यही कहता है। The State Emblem of India (Prohibition of Improper Use) Act, 2005 के तहत राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग केवल केंद्र और राज्य सरकार या उनकी अधिकृत संस्थाएं कर सकती हैं। धार्मिक स्थलों, निजी संगठनों या व्यक्तिगत उपयोग के लिए इसका इस्तेमाल अवैध है। इसका उल्लंघन करने पर दो साल तक की जेल और पाँच हजार रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
राष्ट्रीय ध्वज और प्रतीक दोनों के इस्तेमाल को लेकर कड़े प्रावधान हैं। Flag Code of India के मुताबिक, ध्वज को पूजा स्थलों या धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयोग नहीं किया जा सकता। राष्ट्रीय प्रतीक और ध्वज किसी धर्म से नहीं जुड़ते, बल्कि पूरे राष्ट्र और नागरिकों की एकता के प्रतीक हैं।
इतिहास की दृष्टि से देखें तो हजरतबल दरगाह का निर्माण 17वीं शताब्दी में शाहजहां के सूबेदार सादिक खान ने कराया था। यह दरगाह पैगंबर मुहम्मद साहब की दाढ़ी के बाल की निशानी (असर-ए-शरीफ) के लिए प्रसिद्ध है। आज यह न केवल श्रद्धालुओं का बल्कि पर्यटकों का भी प्रमुख आकर्षण है।
इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या राष्ट्रीय प्रतीकों को धार्मिक स्थलों से दूर रखना चाहिए। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसा करने से ही इनकी सार्वभौमिकता और गरिमा बनी रह सकती है। भारत जैसे बहुधर्मी और विविधतापूर्ण देश में यह कदम सामाजिक सौहार्द और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को मजबूत करेगा।





