निर्विरोध पार्षदों का भविष्य अधर में, चुनाव आयोग की जांच के बाद कोर्ट पहुंचेगा मामला

महाराष्ट्र,राज्य के 29 नगर निगमों के चुनाव में निर्विरोध चुने गए 67 पार्षदों का भविष्य अनिश्चित हो गया है। दबाव और पैसे के जरिए नामांकन वापस कराने के आरोपों के बाद राज्य चुनाव आयोग ने न सिर्फ जांच के आदेश दिए हैं, बल्कि इन उम्मीदवारों के परिणाम भी फिलहाल रोक दिए गए हैं। विपक्षी दलों ने इस पूरे मामले को गंभीर बताते हुए अदालत का रुख करने का ऐलान किया है।
निर्विरोध चुनाव को लेकर सबसे ज्यादा आपत्ति महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने जताई है। पार्टी का कहना है कि कई जगहों पर उम्मीदवारों को धमकाकर और प्रलोभन देकर नामांकन वापस लेने के लिए मजबूर किया गया। एमएनएस ने स्पष्ट किया है कि वह इस मामले में उच्च न्यायालय में याचिका दायर करेगी।
चुनाव आयोग ने पूरे घटनाक्रम पर रिपोर्ट तलब करते हुए जांच शुरू कर दी है। आयोग यह पता लगाएगा कि क्या उम्मीदवारों पर नामांकन वापस लेने के लिए दबाव, धमकी या धन का इस्तेमाल किया गया था। जांच आयोग की रिपोर्ट आने तक निर्विरोध निर्वाचित पार्षदों के परिणाम घोषित नहीं किए जाएंगे।
विपक्षी दलों ने इस स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इतनी बड़ी संख्या में निर्विरोध चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर संदेह पैदा करता है। सांसद संजय राउत, एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे समेत कई नेताओं ने इसे चुनावी प्रणाली के लिए खतरनाक बताया है।
कल्याण-डोम्बिवली, पिंपरी-चिंचवाड़, जलगांव और छत्रपति संभाजीनगर जैसे नगर निगमों में सत्ताधारी दल के बड़ी संख्या में उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए हैं। विपक्ष का आरोप है कि दबाव के चलते कई उम्मीदवारों ने अपना नामांकन वापस लिया।
अब सभी की नजरें जांच आयोग की रिपोर्ट और अदालत के फैसले पर टिकी हैं। माना जा रहा है कि इस प्रकरण का असर महाराष्ट्र के नगर निगम चुनावों की वैधता और भविष्य की चुनावी प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है।





