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अनुशासनहीनता पर नाराज हुए चीफ जस्टिस, कहा- सारी फाइलें फेंक दूंगा

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को एक सुनवाई के दौरान जस्टिस अभय एस ओका अचानक नाराज हो गए. यह तब हुआ जब कोर्टरूम में कई वकील एक साथ बोलने लगे और अपनी-अपनी दलीलें पेश करने लगे. कोर्ट में बढ़ते शोरगुल को देखते हुए जस्टिस ओका ने वकीलों से शांति बनाए रखने और बारी-बारी से दलीलें रखने की अपील की. लेकिन जब वकील फिर भी नहीं माने तो जस्टिस ओका ने सख्त लहजे में अपनी नाराजगी जाहिर की.

जस्टिस अभय एस ओका ने कोर्ट में अनुशासनहीनता पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि मैं इस तरह की अनुशासनहीनता देख-देख कर तंग आ चुका हूं. कोर्ट में रोजाना ऐसा ही होता है. जब हम वकीलों से पूछते हैं कि वे किसके लिए पेश हो रहे हैं, तो कोई स्पष्ट जवाब नहीं देता. गुस्से में उन्होंने कहा कि अगर कोर्ट के भीतर ऐसा ही माहौल रहा तो मैं सारी फाइलें फेंक दूंगा. अब एक नियम बनना चाहिए कि अगर एक ही समय में सभी वकील बहस करने लगेंगे तो उनकी फाइलें फेंक दी जाएंगी. जस्टिस ओका ने यह भी कहा कि इस तरह की अनुशासनहीनता केवल सुप्रीम कोर्ट में देखने को मिलती है. उन्होंने कहा कि मैं कर्नाटक और बॉम्बे हाई कोर्ट में भी रह चुका हूं लेकिन वहां इस तरह की स्थिति कभी नहीं बनी.

यह पहला मौका नहीं है जब जस्टिस अभय एस ओका वकीलों पर भड़के हैं. इससे पहले भी उन्होंने झूठे बयान और गलत तथ्यों पर आधारित दलीलों को लेकर नाराजगी जताई थी. सितंबर 2024 में जस्टिस ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कई मामलों में वकीलों द्वारा दी गई झूठी दलीलों पर कड़ी टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा था कि कई वकील जानबूझकर कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं, जो न्याय प्रणाली के लिए बेहद चिंताजनक है.

कोर्टरूम में बढ़ती अनुशासनहीनता को देखते हुए यह स्पष्ट है कि न्यायाधीशों और वकीलों के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखने की जरूरत है. सुप्रीम कोर्ट भारत की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है जहां अनुशासन और गरिमा बनाए रखना जरूरी है. अगर वकील सुनवाई के दौरान नियमों का पालन नहीं करेंगे तो इससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है.

जस्टिस ओका की टिप्पणी के बाद यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या कोर्ट में अनुशासन बनाए रखने के लिए नए नियम बनाए जाएंगे. संभव है कि कोर्ट में बहस के दौरान वकीलों के लिए कड़े दिशानिर्देश लागू किए जाएं ताकि सुनवाई सुचारू रूप से हो सके. अगर ऐसी व्यवस्था लागू होती है तो इससे न्यायालय की कार्यवाही में सुधार होने की संभावना है.

 

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