छत्तीसगढ़ कांग्रेस के पुनरुद्धार की तलाश: गुटबाजी के ‘वर्टिकल्स’ और अनुभवी नेतृत्व के बीच फंसी चुनावी नैया

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति में 2018 की प्रचंड जीत से 2023 की करारी हार तक का सफर कांग्रेस के लिए किसी झटके से कम नहीं रहा। जिस राज्य को पार्टी का अभेद्य किला माना जाता था, वहां 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सिमटकर 35 सीटों पर आ गई—जो इस सदी का उसका सबसे निचला आंकड़ा है। विश्लेषकों के मुताबिक, इस ऐतिहासिक गिरावट की प्रमुख वजह केवल सत्ता विरोधी लहर नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर व्याप्त गुटबाजी और ‘एकत्व के मंत्र’ का अभाव रहा।
चुनावी नतीजों ने कांग्रेस की क्षेत्रीय कमजोरियों को उजागर किया। दुर्ग संभाग में भूपेश बघेल का प्रभाव सीमित नजर आया, सरगुजा में टीएस सिंहदेव से जुड़ी ‘ढाई साला’ की नाराजगी का असर दिखा, जबकि बस्तर में नए नेतृत्व के तौर पर उभरे दीपक बैज अनुभवहीनता की चुनौती से जूझते दिखे। शहरी इलाकों में लगभग सूपड़ा साफ और ग्रामीण क्षेत्रों में आधी-अधूरी सफलता ने संकेत दिया कि पार्टी का पारंपरिक आधार खिसक चुका है।
इस परिदृश्य में कांग्रेस के भीतर यह बहस तेज है कि क्या पार्टी को नए प्रयोगों की ओर जाना चाहिए या अनुभव को प्राथमिकता देनी चाहिए। कई आकलनों में वरिष्ठ नेता चरणदास महंत एक ऐसे चेहरे के रूप में उभरे हैं, जिन्होंने अपने प्रभाव क्षेत्र की सभी छह सीटें जीतकर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता सिद्ध की। महंत को संगठनात्मक संतुलन साधने, कार्यकर्ताओं के ‘जेनेरिक काडर’ को जोड़ने और नए-पुराने नेतृत्व के बीच सेतु बनाने में सक्षम माना जा रहा है।
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि पार्टी ‘महंत मॉडल’ पर आधारित ब्लूप्रिंट अपनाती है, तो आंतरिक बिखराव यानी गुटीय ‘वर्टिकल्स’ को समाप्त कर एक ‘संयुक्त कमान’ स्थापित की जा सकती है। इस रणनीति में महंत की भूमिका एक सूत्रधार की होगी, जो भूपेश बघेल की आक्रामकता और टीएस सिंहदेव की बौद्धिकता को एक मंच पर लाकर आपसी टकराव को कम कर सके। सरगुजा में विश्वास बहाली, बस्तर में आदिवासी अस्मिता और जल-जंगल-जमीन के मुद्दों पर लक्षित अभियान, तथा शहरी क्षेत्रों में सांस्कृतिक जुड़ाव के जरिए पार्टी को पुनर्स्थापित करने की योजना पर विचार हो रहा है।
संगठनात्मक स्तर पर पार्टी के भीतर ‘शेडो कैबिनेट’ के गठन का सुझाव भी सामने आया है, जो मौजूदा साय सरकार की नीतियों का तथ्यपरक विश्लेषण कर विपक्ष की भूमिका को मजबूत करे। साथ ही, शहरी मतदाताओं को जोड़ने के लिए सॉफ्ट-हिंदुत्व और स्थानीय छत्तीसगढ़ी संस्कृति के मिश्रण के साथ ‘जन-संवाद यात्रा’ जैसी पहल पर भी चर्चा है।
डिजिटल मोर्चे पर कांग्रेस की सोशल मीडिया रणनीति को नए सिरे से गढ़ने की जरूरत महसूस की जा रही है। ‘अनुभव और अस्मिता’ को केंद्र में रखकर “अनुभव के छाँव, विकास के नवा पाँव” जैसे नारों के साथ अभियान चलाने, तथ्यों पर आधारित इन्फोग्राफिक्स और छत्तीसगढ़ी भाषा में छोटे वीडियो संदेशों के जरिए जनता से सीधा संवाद स्थापित करने की बात कही जा रही है।
कुल मिलाकर, कांग्रेस के सामने चुनौती स्पष्ट है—यदि दिल्ली से नेतृत्व को ‘फ्री-हैंड’ मिलता है और अनुभवी नेतृत्व बिखरे हुए संगठन को एक सूत्र में पिरोने में सफल होता है, तो 2028 तक पार्टी एक सशक्त विकल्प के रूप में उभर सकती है। वरना, गुटबाजी के ‘वर्टिकल्स’ उसकी चुनावी नैया को और गहरे संकट में डाल सकते हैं।





