ईस्टर संडे पर चर्चों में में रक्तदान शिविर

बिलासपुर |
रविवार को ईसाई समुदाय ने बड़े श्रद्धा और उल्लास के साथ ईस्टर संडे मनाया। प्रभु यीशु के पुनर्जीवन की स्मृति में मनाया जाने वाला यह पवित्र पर्व शहर के गिरजाघरों में विशेष प्रार्थना सभाओं, सजावट और सामूहिक खुशियों के साथ मनाया गया।
चर्चों में दिखी रौनक – रोशनी और फूलों से सजी प्रार्थनाएं
सुबह से ही शहर के सभी प्रमुख चर्चों में विशेष ईस्टर प्रेयर सर्विस का आयोजन हुआ। चर्च भवनों को लाइटिंग, पुष्प सजावट और रंगीन झंडियों से सजाया गया था। श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे को “हैप्पी ईस्टर” कहकर प्रभु यीशु के पुनर्जीवन की खुशियां साझा कीं।
क्या है ईस्टर की पृष्ठभूमि?
ईस्टर, ईसाई धर्म का सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक त्योहार माना जाता है। मान्यता है कि गुड फ्राइडे के दिन प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया और तीसरे दिन यानी रविवार को वे पुनः जीवित हो गए। इसी चमत्कारिक घटना की स्मृति में यह दिन आशा, पुनर्जीवन और ईश्वर के प्रेम का प्रतीक बन गया है।
पास्टर निखिल पॉल ने क्या कहा?
“ईस्टर केवल धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, बलिदान और आशा का संदेश है। यह हमें सिखाता है कि हर अंधकार के बाद उजाला आता है।” – पास्टर निखिल पॉल
समाज सेवा के साथ मनाया गया पर्व
इस मौके पर कुछ चर्चों में रक्तदान शिविर और भोजन वितरण जैसे सेवा कार्यों का आयोजन भी किया गया, जिसमें युवाओं और श्रद्धालुओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
ईस्टर की परंपराएं भी अब आधुनिक रंग ले चुकी हैं। रंग-बिरंगे ईस्टर एग्स, ईस्टर बनीज (खरगोश के प्रतीक), और बच्चों के लिए आयोजित ईस्टर एग हंट्स ने त्योहार में उमंग जोड़ दी। अंडा जीवन और पुनर्जन्म का प्रतीक माना जाता है – इसलिए ईस्टर पर इसे सजाने और बांटने की परंपरा है।
ईस्टर का संदेश
“अंधकार के बाद उजाला, मृत्यु के बाद जीवन”, यही है ईस्टर का मूल संदेश। यह त्योहार हमें बताता है कि विश्वास, प्रेम और उम्मीद की ताकत हर परिस्थिति को बदल सकती है।





