एसआईआर में बड़े पैमाने पर नाम कटने से विधायकों की बढ़ी चिंता, चुनावी समीकरण बिगड़ने के आसार

आगामी स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों से पहले रायपुर जिले के विधायकों की चिंता बढ़ती नजर आ रही है। विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने से राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। इसका असर आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों पर भी पड़ सकता है।

रायपुर जिले की सात विधानसभा सीटों रायपुर ग्रामीण, उत्तर, पश्चिम, दक्षिण, धरसींवा, आरंग और अभनपुर में एसआईआर के दौरान कुल करीब पांच लाख मतदाताओं के नाम सूची से काटे गए हैं। अब तक इनमें से केवल लगभग 20 हजार नाम ही दोबारा जोड़े जा सके हैं। इससे स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में मतदाता अभी भी सूची से बाहर हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव में जितने वोटों से विधायक जीते थे, उससे कहीं ज्यादा मतदाताओं के नाम अब कट चुके हैं। जिले की सभी सात सीटों पर भाजपा के विधायक हैं और फिलहाल यहां कोई कांग्रेस विधायक नहीं है। ऐसे में सबसे ज्यादा असर सत्ताधारी दल के विधायकों पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

एसआईआर में सबसे ज्यादा नुकसान रायपुर ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र में हुआ है, जहां एक लाख से अधिक मतदाता सूची से बाहर हो गए। इसी तरह रायपुर पश्चिम, उत्तर और दक्षिण क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में नाम कटे हैं, जो पिछली जीत के अंतर से कहीं अधिक हैं।

नाम जुड़वाने की प्रक्रिया भी धीमी गति से चल रही है। बीएलओ को प्रतिदिन बहुत कम आवेदन मिल रहे हैं। जिन मतदाताओं को नोटिस भेजे गए थे, उनमें से भी बड़ी संख्या ने अब तक जवाब नहीं दिया है। अधिकारी घर-घर जाकर संपर्क कर रहे हैं, इसके बावजूद अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पा रहा है।

मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर कटौती से महिला और पुरुष मतदाताओं के अनुपात पर भी असर पड़ने की संभावना है। कई क्षेत्रों में महिलाओं के नाम ज्यादा कटे हैं, जिससे नई सूची में संतुलन बिगड़ सकता है।

इसके अलावा, नाम जोड़ने को लेकर विधायकों की सक्रियता भी सीमित नजर आ रही है। दूसरी ओर विपक्ष का आरोप है कि उनके समर्थकों के नाम जानबूझकर हटाए जा रहे हैं। इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम दोबारा नहीं जोड़े गए, तो इसका सीधा असर मतदान प्रतिशत और चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है। प्रशासन और राजनीतिक दलों के सामने अब मतदाता जागरूकता और नाम जोड़ने की प्रक्रिया को तेज करने की बड़ी चुनौती है।

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