यूपी में मतदाता सूची पुनरीक्षण में सामान्य निवास प्रमाणपत्र अमान्य, हजारों वोटरों की बढ़ी परेशानी

पश्चिम बंगाल के बाद अब उत्तर प्रदेश में भी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान सामान्य निवास प्रमाणपत्र को मान्य नहीं किया जा रहा है। चुनाव आयोग के इस फैसले से बड़ी संख्या में मतदाताओं को मतदाता सूची में नाम जुड़वाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि इस प्रक्रिया में केवल स्थायी निवास प्रमाणपत्र ही स्वीकार किया जाएगा।
विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान अपने अंतिम चरण में है और मतदाता सूची का प्रारूप जल्द जारी होना है। इससे पहले छूटे हुए नामों को शामिल करने के लिए सीमित समय दिया गया था, लेकिन अब तक अपेक्षाकृत कम आवेदन ही सामने आए हैं। जिन मतदाताओं का वर्ष 2003 की मतदाता सूची से मिलान नहीं हो पाया है, उन्हें नोटिस भेजे जा रहे हैं। ऐसे मामलों में निवास प्रमाण के तौर पर प्रस्तुत सामान्य निवास प्रमाणपत्र को आयोग ने खारिज कर दिया है।
प्रदेश के लगभग सभी जिलों में मतदाताओं को इस निर्णय के कारण परेशानी झेलनी पड़ रही है। चुनाव आयोग ने मैपिंग सत्यापन के लिए 13 दस्तावेजों की सूची जारी की है, जिसमें सक्षम राज्य प्राधिकारी द्वारा जारी स्थायी निवास प्रमाणपत्र को शामिल किया गया है। हालांकि, उत्तर प्रदेश में वर्तमान व्यवस्था के तहत तहसील और जिला स्तर पर केवल सामान्य निवास प्रमाणपत्र ही जारी किए जा रहे हैं, जो राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं में मान्य हैं।
अधिकारियों के अनुसार राज्य सरकार ने वर्षों पहले स्थायी या मूल निवास प्रमाणपत्र जारी करने की व्यवस्था समाप्त कर दी थी। अब शिक्षा, पेंशन और अन्य योजनाओं के लिए सामान्य निवास प्रमाणपत्र ही पर्याप्त माना जाता है। इसके बावजूद निर्वाचन अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि केवल स्थायी निवास प्रमाणपत्र को ही स्वीकार किया जाए।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि सामान्य निवास प्रमाणपत्र अल्प अवधि के निवास पर भी जारी हो सकता है, जिससे विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य पूरा नहीं होता। आयोग का मानना है कि इस प्रक्रिया का मकसद लंबे समय से निवास कर रहे वास्तविक मतदाताओं की पहचान करना है, इसलिए अस्थायी प्रकृति के दस्तावेज स्वीकार नहीं किए जा सकते।
जानकारी के अनुसार स्थायी निवास प्रमाणपत्र किसी राज्य में लंबे समय तक निवास और संपत्ति से जुड़ा होता है तथा इसे जारी करने से पहले सत्यापन की प्रक्रिया अपनाई जाती है। वहीं सामान्य निवास प्रमाणपत्र अल्प अवधि के निवास पर भी मिल जाता है और इसकी वैधता अस्थायी होती है। इसी अंतर के आधार पर चुनाव आयोग ने अपने निर्णय को सही ठहराया है।





