जबलपुर में दूषित पेयजल बना बड़ी बीमारी की वजह, एक साल में हजारों लोग अस्पताल पहुंचे

जबलपुर। शहर और जिले में दूषित पेयजल लोगों की सेहत पर भारी पड़ रहा है। बीते एक साल में गंदा पानी पीने से करीब 50 हजार लोग जलजनित बीमारियों की चपेट में आए हैं। उल्टी-दस्त, पेट दर्द, बुखार और पीलिया जैसे लक्षणों के साथ मरीज लगातार सरकारी और निजी अस्पतालों में इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। बरसात के महीनों में हालात और गंभीर हो जाते हैं, जब प्रतिदिन औसतन 15 से 20 मरीज स्वास्थ्य केंद्रों में उपचार के लिए आ रहे हैं।

संभाग के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल की पेयजल व्यवस्था खुद सवालों के घेरे में है। अस्पताल परिसर में कई जगह नालियों के ऊपर से पेयजल की पाइप लाइन गुजर रही है। वाटर कूलर बंद पड़े हैं और साफ-सफाई के दावे हकीकत में कमजोर नजर आते हैं। टंकियों की समय पर सफाई नहीं हो पा रही है, जबकि कई वाटर प्यूरीफायर लंबे समय से खराब हैं।

कायाकल्प योजना में प्रदेश में अव्वल रहे जिला अस्पताल विक्टोरिया की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। यहां पाइप लाइनों में लीकेज है, कई नलों में पानी नहीं आता और पूरा सिस्टम भूजल पर निर्भर है। अब तक अस्पताल को नर्मदा जल की आपूर्ति नहीं मिल सकी है।

अस्पताल परिसरों में स्थित कई पानी की टंकियों के ढक्कन खुले हुए हैं, जिससे दूषित तत्वों के पानी में मिलने का खतरा बना रहता है। ऑपरेशन थिएटर और डायलिसिस यूनिट को छोड़ दें तो अन्य वार्डों में आरओ वाटर की सुविधा नहीं है। सभी वार्डों में वाटर फिल्टर लगाने की योजना अभी अधर में है।

छावनी परिषद के अस्पताल और जिला अस्पताल परिसर में जगह-जगह कचरे के ढेर, गंदा पानी और पेयजल लाइन में लीकेज व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार दूषित पानी से हैजा, टाइफाइड, पेचिश, डायरिया और हेपेटाइटिस ए जैसी गंभीर बीमारियां होती हैं, जो कई बार जानलेवा साबित हो सकती हैं।

बीते महीनों में जिले के विभिन्न इलाकों में दूषित पानी से सामूहिक रूप से लोग बीमार पड़े। जून में पाटन क्षेत्र में 20 लोग बीमार हुए, फरवरी में सिहोरा के भंडारा गांव के 50 लोगों को अस्पताल लाना पड़ा, जबकि बरगी के निगरी गांव में 70 लोग इसकी चपेट में आए।

70 साल पुराने मेडिकल कॉलेज अस्पताल में पेयजल आपूर्ति के लिए ओवरहेड टैंकों का उपयोग किया जा रहा है। पहले इन टंकियों की सफाई छह माह में एक बार होती थी, अब प्रतिमाह सफाई कराने के निर्देश दिए गए हैं। जिला अस्पताल में भी टंकियों की सफाई तीन माह में एक बार की जाती है और क्लोरीन नियमित रूप से डाली जा रही है।

हालांकि जलजनित रोगों के मरीजों की संख्या फिलहाल कम बताई जा रही है, लेकिन औसतन 15 से 20 मरीज अब भी नियमित रूप से जिला अस्पताल, मेडिकल कॉलेज और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में उपचार के लिए पहुंच रहे हैं। प्रशासन का दावा है कि पेयजल की गुणवत्ता सुधारने और नर्मदा जल उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हालात अभी भी चिंता का विषय बने हुए हैं।

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