महमूदाबाद मामले में राहत के संकेत, सुप्रीम कोर्ट ने जिम्मेदार आचरण की दी सलाह

अशोका यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर और पॉलिटिकल साइंस विभाग के प्रमुख अली खान महमूदाबाद के खिलाफ दर्ज मामले के समाप्त होने की संभावना बढ़ गई है। हरियाणा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि अब तक प्रोफेसर के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं दी गई है। इस पर शीर्ष अदालत ने संकेत दिए कि यदि राज्य सरकार आगे मंजूरी नहीं देती है तो मामला बंद किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने उस अंतरिम आदेश को आगे बढ़ा दिया है, जिसके तहत ट्रायल कोर्ट को प्रोफेसर के खिलाफ दर्ज एफआईआर में दाखिल चार्जशीट पर विचार करने से रोका गया था। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान दिया। अदालत को बताया गया कि चार्जशीट अगस्त 2025 में दाखिल की गई थी, लेकिन अभियोजन की स्वीकृति अब तक नहीं मिली है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि राज्य सरकार उदारता दिखाते हुए मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं देती है, तो प्रोफेसर से भी अपेक्षा की जाती है कि वे जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करें। पीठ ने कहा कि मामले के बंद होने की स्थिति में यह उम्मीद रहेगी कि संबंधित व्यक्ति भविष्य में सार्वजनिक मंचों पर सोच-समझकर टिप्पणी करें।
अदालत ने हरियाणा सरकार को इस विषय पर स्पष्ट निर्देश लेने के लिए अतिरिक्त समय देते हुए मामले की सुनवाई छह सप्ताह के लिए स्थगित कर दी। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि सरकार अंतिम रूप से मंजूरी नहीं देने का फैसला करती है, तो मामले के गुण-दोष में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
प्रोफेसर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि इस पूरे प्रकरण में ऐसा कुछ नहीं है, जो आपराधिक कार्रवाई को उचित ठहराता हो। वहीं अदालत ने यह स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।
यह मामला पिछले साल मई में सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणियों से जुड़ा है, जिनके आधार पर प्रोफेसर के खिलाफ दो अलग-अलग मामले दर्ज किए गए थे। उन पर देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने जैसे आरोप लगाए गए थे। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत की शर्तों में ढील देते हुए उन्हें लिखने और विचार व्यक्त करने की अनुमति दी थी, बशर्ते कि विचाराधीन मामले पर टिप्पणी न की जाए।
अब शीर्ष अदालत की ताजा टिप्पणियों के बाद यह संकेत मिल रहे हैं कि यदि राज्य सरकार अभियोजन की मंजूरी नहीं देती है, तो यह मामला यहीं समाप्त हो सकता है।





