राष्ट्रपति से सम्मानित जूडो चैंपियन योगिता, संघर्ष से बनाई जीत की पहचान

नक्सल प्रभावित बस्तर अंचल से निकलकर राष्ट्रीय मंच पर पहचान बनाने वाली 13 वर्षीय जूडो खिलाड़ी योगिता मंडावी को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। नई दिल्ली में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। पुरस्कार मिलने के बाद योगिता छत्तीसगढ़ लौटीं और अपने परिवार के पास जाने से पहले अपने संघर्ष और सफर को साझा किया।

कम उम्र में माता-पिता को खोने के बाद योगिता का बचपन कठिनाइयों में बीता। चार साल की उम्र में पिता और फिर मां के निधन के बाद वह नानी के पास रहीं। बाद में उन्हें बालिका गृह में रहना पड़ा, जहां शुरुआती दिनों में वह डरी-सहमी और बेहद चुप रहती थीं। इसी दौरान मणि शर्मा उनके जीवन में अभिभावक और मार्गदर्शक बनकर आईं, जिन्होंने योगिता को खेलों से जोड़ा।

बालिका गृह में विभिन्न खेल आजमाने के बाद योगिता का रुझान जूडो की ओर हुआ। उन्होंने बताया कि जूडो ने उन्हें आत्मविश्वास और अंदरूनी ताकत दी। पहली राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में सिल्वर मेडल जीतने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बीते तीन वर्षों में वह सात राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुकी हैं और खेलो इंडिया समेत कई बड़े आयोजनों में पदक जीत चुकी हैं।

योगिता ने बताया कि जूडो में सबसे बड़ी चुनौती वजन नियंत्रण होती है। कई बार प्रतियोगिता से पहले दो-दो दिन भूखा रहना पड़ा, चक्कर भी आए और डर भी लगा, लेकिन मैट पर उतरते ही उन्होंने हर कमजोरी को पीछे छोड़ दिया। उनके मुताबिक, मुकाबले के दौरान सामने वाले खिलाड़ी को अपने हालात का अंदाजा तक नहीं होने दिया।

आज योगिता की दिनचर्या बेहद सख्त है। सुबह जल्दी उठकर रनिंग, जिम और जूडो की ट्रेनिंग करती हैं और शाम को फिर अभ्यास होता है। थकान के बावजूद रुकने का विकल्प नहीं होता। हाल ही में खेलो इंडिया में प्रदर्शन के बाद उनका चयन भारतीय खेल प्राधिकरण में भी हुआ है।

प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से मुलाकात को योगिता अपने जीवन का यादगार पल मानती हैं। प्रधानमंत्री ने उन्हें लगातार मेहनत करने और देश का नाम रोशन करने का संदेश दिया, जबकि राष्ट्रपति की मुस्कान और शाबाशी ने उन्हें नई ऊर्जा दी।

योगिता का सपना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए पदक जीतना है। इसके साथ ही वह पढ़ाई जारी रखकर कलेक्टर बनना चाहती हैं। अपने जैसे हालात से गुजर रहे बच्चों को संदेश देते हुए वह कहती हैं कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, मेहनत, अनुशासन और धैर्य से रास्ता जरूर निकलता है।

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