छत्तीसगढ़ की मिट्टी कुपोषित, 1.75 लाख नमूनों में 76 प्रतिशत में नाइट्रोजन लगभग खत्म

छत्तीसगढ़ की कृषि भूमि की सेहत को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। प्रदेश के 33 जिलों से लिए गए 1 लाख 75 हजार से अधिक मिट्टी के नमूनों की जांच में यह सामने आया है कि करीब 76 प्रतिशत नमूनों में नाइट्रोजन की मात्रा लगभग शून्य है। इसके साथ ही आधे से ज्यादा नमूनों में ऑर्गेनिक कार्बन की भी भारी कमी दर्ज की गई है, जिससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता लगातार कमजोर हो रही है।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, असंतुलित खेती और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया है। ऑर्गेनिक कार्बन की कमी के कारण मिट्टी पोषक तत्वों को रोककर रखने में असमर्थ हो गई है। ऐसे में खेतों में डाली जाने वाली यूरिया और अन्य खाद या तो पानी के साथ बह जाती है या धूप में गैस बनकर उड़ जाती है, जिससे किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता।
जांच रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कई इलाकों में फास्फोरस और पोटाश की कमी भी चिंता का विषय है। कुछ जिलों में खेतों की स्थिति बेहद खराब पाई गई, जहां लगभग सभी नमूने पोषक तत्वों से विहीन हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते संतुलित और वैज्ञानिक खेती नहीं अपनाई गई, तो जमीन के बंजर होने का खतरा बढ़ सकता है।
मृदा परीक्षण के आधार पर खेती की जरूरत
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि बिना मृदा परीक्षण के रासायनिक खाद का उपयोग न करें। मृदा स्वास्थ्य कार्ड की रिपोर्ट के आधार पर ही उर्वरकों का संतुलित प्रयोग किया जाए। इससे न सिर्फ उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी लंबे समय तक बनी रहेगी।
पोषक तत्वों की कमी का असर फसलों पर
नाइट्रोजन की कमी से पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, विकास रुक जाता है और पैदावार घट जाती है। वहीं अधिकता होने पर फसल कमजोर हो जाती है और बीमारियों का खतरा बढ़ता है। पोटाश की कमी से पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटती है, जबकि फास्फोरस की कमी जड़ों के विकास और दानों के भराव को प्रभावित करती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जैविक खाद, गोबर की खाद और हरी खाद के उपयोग को बढ़ावा देकर मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। इससे खेती टिकाऊ बनेगी और भविष्य में उत्पादन पर पड़ने वाले खतरे को कम किया जा सकेगा।





