रूस 55 से अधिक देशों को हथियार देता है, भारत प्रमुख साझेदार

रूस दुनिया के सबसे बड़े हथियार निर्यातक देशों में शामिल है. विभिन्न वैश्विक रक्षा रिपोर्टों के मुताबिक, रूस पिछले दो दशकों में 55 से अधिक देशों को टैंक, लड़ाकू विमान, हेलिकॉप्टर, मिसाइल सिस्टम और एयर डिफेंस तकनीक की आपूर्ति कर चुका है. एशिया में भारत, चीन, वियतनाम, म्यांमार और बांग्लादेश रूस से हथियार लेने वाले प्रमुख देश हैं. इसके अलावा, मध्य पूर्व में ईरान, इराक, सीरिया, मिस्र और अल्जीरिया, जबकि अफ्रीका में अंगोला, नाइजीरिया और इथियोपिया जैसे देशों के साथ भी रूस की बड़ी रक्षा साझेदारी रही है.
भारत और रूस के रक्षा रिश्ते पारंपरिक रूप से बेहद मजबूत रहे हैं. भारतीय वायुसेना के मिग-21, मिग-29 और सुखोई-30 एमकेआई जैसे प्रमुख फाइटर जेट रूस की तकनीक पर आधारित हैं. थलसेना के बेड़े में टी-72 और टी-90 टैंक, बीएमपी-2 इंफैंट्री वाहन और मल्टी बैरल रॉकेट सिस्टम भी रूसी मूल के हैं. वहीं, भारतीय नौसेना द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रमादित्य, कई फ्रिगेट, पनडुब्बियां और परमाणु संचालित अटैक सबमरीन रूस से लीज़ पर ली गई तकनीक पर आधारित हैं.
रूस का हथियार पोर्टफोलियो अत्यंत व्यापक है. इसमें लॉन्ग रेंज एयर डिफेंस सिस्टम एस-300 और एस-400, शॉर्ट और मीडियम रेंज सुरक्षा प्रणाली जैसे टॉर, बुक, पैंट्सिर, जमीन से जमीन और जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइलें, मिग-सुखोई सीरीज़ के फाइटर विमान, एमआई-17, एमआई-26 जैसे ट्रांसपोर्ट हेलिकॉप्टर, एमआई-28 और केए-52 जैसे अटैक हेलिकॉप्टर, टी-72/टी-90/टी-80 टैंक, भविष्य की टी-14 आर्माटा टैंक तकनीक, परमाणु और डीज़ल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां, एंटी-शिप मिसाइल, टॉरपीडो, असॉल्ट-स्नाइपर-मशीन गन श्रेणी के छोटे हथियार, सर्विलांस रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, कमांड-कंट्रोल नेटवर्क और रक्षा सिमुलेटर शामिल हैं.
रूसी हथियारों की तकनीक मजबूत और युद्ध-कठोर मानी जाती है. एस-400 जैसे सिस्टम लंबी दूरी पर कई लक्ष्यों को ट्रैक करने और उन्हें बेअसर करने की क्षमता रखते हैं. रूस हाइपरसोनिक और सुपरसोनिक मिसाइल तकनीक में भी अग्रणी दावेदार रहा है, जिसमें भारत के साथ संयुक्त रूप से विकसित ब्रह्मोस मिसाइल सबसे अहम उदाहरण है. यह मिसाइल जमीन, समुद्र और हवा, तीनों प्लेटफॉर्म से लॉन्च की जा सकती है और अपनी गति व सटीकता के लिए जानी जाती है.
भारत अब सिर्फ हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और स्वदेशी उत्पादन में बराबर की हिस्सेदारी चाहता है. रूस इस मॉडल के लिए अपेक्षाकृत अधिक खुला रहा है, जिसके कारण दोनों देशों के बीच रक्षा उपकरणों के संयुक्त निर्माण, स्पेयर पार्ट्स उत्पादन और सैन्य अनुसंधान परियोजनाओं पर लगातार सहयोग बढ़ रहा है.
पुतिन की हर विदेश यात्रा से पहले रक्षा सौदों की चर्चा तेज हो जाती है, क्योंकि रूस हथियार व्यापार को अपनी सैन्य कूटनीति का रणनीतिक हिस्सा मानता है. भारत-रूस शिखर सम्मेलन से यह संदेश और मजबूत होता है कि नई दिल्ली बहुध्रुवीय वैश्विक संतुलन की नीति पर कायम है और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए सभी प्रमुख देशों के साथ विकल्प खुले रखना चाहती है.





