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आत्मसमर्पण की लहर ने बस्तर में बदली तस्वीर, 161 माओवादी बने मुख्यधारा का हिस्सा

बस्तर में माओवादी हिंसा के चार दशक लंबे इतिहास में पहली बार हालात इतनी तेजी से बदलते नज़र आ रहे हैं। दंडकारण्य के सबसे प्रभावशाली कमांडर हिड़मा की मुठभेड़ में मौत और उसके बाद शीर्ष नेताओं भूपति व रूपेश के आत्मसमर्पण ने माओवादी संगठन को गहरे स्तर तक कमजोर कर दिया है।

इन घटनाओं के बाद क्षेत्र में माओवादी कैडरों के मनोबल में भारी गिरावट देखी गई, जिसका सीधा असर समर्पण की बढ़ती संख्या के रूप में सामने आया। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, पिछले 10 दिनों में सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर और तेलंगाना की सीमावर्ती इलाकों में कुल 161 माओवादियों ने हथियार छोड़कर मुख्यधारा में वापसी की है। इनमें तीन करोड़ रुपये से अधिक के संयुक्त इनामी माओवादी भी शामिल हैं।

इस बीच, महाराष्ट्र–मध्यप्रदेश–छत्तीसगढ़ (MMC) स्पेशल जोनल कमेटी के प्रवक्ता ‘अनंत’ ने ऑडियो और लिखित संदेश जारी कर 1 जनवरी 2026 को संगठन स्तर पर सामूहिक सरेंडर की घोषणा की है। इस निर्णय में छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री की हालिया प्रतिक्रिया के बाद समयसीमा को पहले से कम कर 1 जनवरी तय किया गया है। प्रवक्ता ने कैडरों से अपील की है कि वे किसी भी अभियान में भाग न लें और आंतरिक संपर्क बनाए रखें।

समर्पण की इस लहर के बीच 25 लाख रुपये के इनामी 63 वर्षीय चैतू उर्फ श्याम दादा समेत 10 माओवादियों ने पुलिस समन्वय केंद्र में अधिकारियों और आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में संविधान की प्रति थामते हुए आत्मसमर्पण किया। इनके सिर पर कुल 65 लाख रुपये का इनाम घोषित था।

आत्मसमर्पण करने के बाद चैतू ने कहा कि भूपति और रूपेश जैसे नेताओं के फैसलों ने संगठन के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हथियारों की लड़ाई अब बीते वक्त की बात हो चुकी है और इसी समझ के साथ वह मुख्यधारा में लौटने का फैसला कर चुका है। पुनर्वास प्रक्रिया से जुड़े पूर्व माओवादी नेता रूपेश ने भी चैतू के निर्णय का समर्थन किया और अन्य कैडरों से जंगल छोड़कर जीवन और विकास की राह चुनने की अपील की है।

सुरक्षा बलों का मानना है कि यह बदलाव नेतृत्व के भीतर उभरे संकट और विचारधारात्मक प्रभाव के लगातार कमजोर पड़ने का परिणाम है। पुलिस और केंद्रीय बल माओवादी ढांचे के बचे नेताओं से भी हथियार छोड़कर लौटने की अपील कर रहे हैं, साथ ही इलाके में शांति और विकास की नई दिशा पर जोर दे रहे हैं।

समर्पण अभियान की बढ़ती संख्या ने एक बात साफ कर दी है कि बस्तर में माओवादी संघर्ष अब तेजी से अपने अंत की ओर बढ़ रहा है और जनजीवन एक नई शुरुआत की ओर अग्रसर है।

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