50% से अधिक आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चेतावनी– गलत पाया तो चुनाव तुरंत रद्द

महाराष्ट्र सरकार द्वारा स्थानीय निकाय चुनावों में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण देने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने साफ कहा है कि जहां-जहां भी आरक्षण की अधिकतम सीमा का उल्लंघन हुआ है, वहां होने वाले चुनाव परिणाम अदालत के अंतिम फैसले पर निर्भर रहेंगे। यदि कोर्ट ने तय किया कि आरक्षण सीमा का उल्लंघन असंवैधानिक है, तो इन निकायों के चुनाव नतीजे तुरंत रद्द कर दिए जाएंगे।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा कि वह कैसे 50 प्रतिशत की संवैधानिक सीमा से अधिक आरक्षण को जायज ठहराएगी। सरकार की ओर से पेश हुए कानून अधिकारियों ने कहा कि इस मामले में राज्य चुनाव आयोग से परामर्श जरूरी है, इसलिए समय दिया जाए। इसके बाद कोर्ट ने सुनवाई को आगे बढ़ाते हुए अगली तारीख तय कर दी।
मामले से जुड़े वरिष्ठ वकीलों ने अदालत को बताया कि राज्य की 288 नगर परिषदों और नगर पंचायतों में से 57 निकाय ऐसे हैं जहां आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक हो गई है। इन निकायों के चुनाव 2 दिसंबर के लिए अधिसूचित किए जा चुके हैं। कोर्ट ने इस जानकारी पर नाराजगी जताते हुए स्पष्ट कर दिया कि इन 57 निकायों में किसी भी उम्मीदवार की जीत या हार अदालत के निर्णय के अधीन रहेगी।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि चुनाव प्रक्रिया को अवैध पाया गया तो उसे निरस्त करने का पूरा अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास है। हालांकि कुछ पक्षकारों ने इसे सार्वजनिक धन की बर्बादी बताते हुए चुनावी प्रक्रिया रोकने की मांग की, लेकिन कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक व्यवस्था से समझौता नहीं किया जा सकता।
वरिष्ठ वकीलों ने तर्क दिया कि 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा संविधान द्वारा निर्धारित ‘लक्ष्मण रेखा’ है, जिसे पार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग से उन निकायों की पूर्ण सूची मांगी है जहां सीमा का उल्लंघन हुआ है। महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव 2021 से OBC आरक्षण विवाद के कारण कई बार टल चुके हैं। पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि ओबीसी आरक्षण तभी लागू होगा जब ‘ट्रिपल टेस्ट’ की सभी शर्तें पूरी हों।
इस पूरे विवाद पर अब 28 नवंबर को अगली सुनवाई होगी, जिसमें यह तय होने की संभावना है कि आरक्षण संरचना संवैधानिक है या नहीं, और इसका चुनावी प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ेगा।





