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महाराजगंज में सियासी हलचल: यादव, महतो और मुस्लिम वोटर्स तय करेंगे बिहार चुनाव की दिशा

सिवान। बिहार के सिवान जिले का महाराजगंज विधानसभा क्षेत्र राज्य की राजनीति में विशेष महत्व रखता है। यह क्षेत्र महाराजगंज लोकसभा सीट का हिस्सा है और 1951 के गठन से अब तक राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था के कई उतार-चढ़ाव देख चुका है।

क्षेत्र पूरी तरह ग्रामीण और कृषि प्रधान है। यहां की भूमि उपजाऊ है और धान, गेहूं तथा गन्ने की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। गंडक नदी आसपास के गांवों की सिंचाई की रीढ़ है। इसके अलावा चावल मिलें, ईंट भट्ठे और कुछ छोटे उद्योग स्थानीय लोगों को रोजगार और आर्थिक सहारा प्रदान करते हैं।

नगर क्षेत्र आसपास के ग्रामीण इलाकों के लिए व्यापारिक केंद्र के रूप में कार्य करता है। महाराजगंज सिवान, छपरा और गोपालगंज से जुड़ा है और राजधानी पटना से लगभग 133 किलोमीटर दूर है। कृषि, सड़क, सिंचाई और रोजगार जैसे मुद्दे चुनावी एजेंडे में प्रमुख बने हुए हैं।

अब तक इस सीट पर 17 चुनाव हो चुके हैं। जनता दल (यूनाइटेड) ने पांच बार जीत दर्ज की है, जिसमें 2000 में समता पार्टी के तहत मिली जीत शामिल है। कांग्रेस और जनता पार्टी ने तीन-तीन बार, जबकि अन्य दलों ने एक-एक बार सफलता पाई। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अभी तक इस सीट पर जीत दर्ज नहीं कर पाए हैं। 2020 में जेडीयू की जीत का सिलसिला लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) की भागीदारी से टूटा।

2024 के चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, महाराजगंज की जनसंख्या 5,25,485 है, जिसमें पुरुष 2,69,376 और महिलाएं 2,56,109 हैं। कुल मतदाता 3,15,954 हैं। क्षेत्र के मतदाता मुख्य रूप से ग्रामीण हैं, शहरी मतदाता केवल 5.91 प्रतिशत हैं। यादव, महतो, अनुसूचित जाति और मुस्लिम मतदाताओं की उपस्थिति निर्णायक मानी जाती है।

राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि महाराजगंज में जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे आगामी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। चुनावी इतिहास और बदलते राजनीतिक समीकरण इसे बिहार की राजनीति के सबसे दिलचस्प क्षेत्रों में से एक बनाते हैं।

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