गांधी और टालस्टॉय: सत्य और अहिंसा के दो पूरक

महात्मा गांधी के जीवन और उनके अहिंसा के प्रयोग में लियो टालस्टॉय का प्रभाव अत्यधिक रहा। रूस के राजपरिवार में जन्मे टालस्टॉय ने अपने जीवन में सादगी, सरलता और सेवा का मार्ग अपनाया। उन्होंने अपने आराम और सुख-सुविधा को त्यागकर गरीबों, पीड़ितों और वंचितों की सेवा की। गांधी ने टालस्टॉय को आधुनिक युग का सबसे बड़ा ऋषि कहा। अगर टालस्टॉय नहीं होते, तो गांधी शायद सत्य और अहिंसा के प्रयोग में सफल नहीं हो पाते।
टालस्टॉय की सादगी और उनके जीवन का आदर्श गांधी के लिए मार्गदर्शक बना। उन्होंने अपने अमीर जीवन को छोड़कर आत्मसात किया कि बाहरी और आंतरिक सादगी ही जीवन का वास्तविक मार्ग है। गांधी ने लिखा कि टालस्टॉय ने अपने सिद्धांतों के पालन के लिए जीवन समर्पित किया और कभी डिगे नहीं। उनके विचारों में अहिंसा केवल हिंसा का अभाव नहीं, बल्कि प्रेम, सर्वथा बैर-भाव का त्याग और दृढ़ता का प्रतीक थी।
गांधी ने अहिंसा को प्रेम का महासागर कहा। उन्होंने बताया कि केवल प्राणियों को नुकसान न पहुंचाना ही अहिंसा नहीं है, बल्कि दुखी प्राणी को राहत देना, उनकी पीड़ा में सहभागी बनना ही वास्तविक अहिंसा है। टालस्टॉय के अनुसार अहंभाव जीवन का आधार है और इसके बिना व्यक्ति का अस्तित्व नहीं टिक सकता। गांधी ने इस दृष्टिकोण को आत्मसात कर स्वतंत्रता आंदोलन में इसका प्रयोग किया।
टालस्टॉय ने रूस में सामंती और पिछड़े समाज में हिंसाहीन सामाजिक परिवर्तन की संभावना दिखाई। उनके विचारों ने युवाओं और समाज सुधारकों को नए मार्ग दिखाए। गांधी ने उनकी अहिंसक क्रांति के सिद्धांतों को अपनाकर ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ संघर्ष किया। उन्होंने सत्य और अहिंसा के प्रयोग के माध्यम से भारत को स्वतंत्र कराने में सफलता पाई।
गांधी और टालस्टॉय के विचार एक-दूसरे के पूरक थे। गांधी ने टालस्टॉय की सादगी और सिद्धांतों से प्रेरणा पाई, वहीं टालस्टॉय का जीवन गांधी के प्रयोग के माध्यम से जीवंत हुआ। इस प्रकार, दोनों महान व्यक्तित्वों और उनके विचार भारतीय और विश्व इतिहास में आज भी प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं।





