सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न के आरोप में सास को किया बरी, कहा- “ऐसी बातें हवा से भी तेज फैलती हैं”

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न से जुड़े एक अहम मामले में फैसला सुनाते हुए एक महिला को बरी कर दिया, जिस पर अपनी बहू को दहेज के लिए प्रताड़ित करने का आरोप था। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में अक्सर ससुराल पक्ष द्वारा दहेज को लेकर प्रताड़ित किए जाने की बातें तेजी से फैलती हैं, लेकिन यदि पर्याप्त सबूत न हों तो किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
यह मामला उत्तराखंड का था, जहां मृतक महिला के पिता ने जून 2001 में शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी बेटी गर्भवती होने के दौरान वैवाहिक घर में मृत पाई गई। उन्होंने आरोप लगाया था कि बेटी की सास दहेज को लेकर ताने मारती थी और इसी कारण उसने आत्महत्या की। इस मामले में ससुर, देवर और सास को आरोपी बनाया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई के बाद ससुर और देवर को बरी कर दिया, लेकिन सास को दोषी मानते हुए तीन साल की सजा सुनाई थी। हाई कोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। इसके खिलाफ महिला ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया शामिल थे, ने कहा कि गवाह के रूप में पेश हुई पड़ोसन के पास यह साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य नहीं थे कि आत्महत्या दहेज की वजह से ही हुई थी। अदालत ने टिप्पणी की कि दहेज प्रताड़ना की बातें अक्सर तेजी से लोगों तक पहुंच जाती हैं, लेकिन केवल अनुमान या सुनी-सुनाई बातों के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।
न्यायालय ने कहा कि चारदीवारी के भीतर होने वाली घटनाओं को लेकर प्रत्यक्ष गवाह मिलना मुश्किल होता है, लेकिन फिर भी आरोप को साबित करने के लिए ठोस तथ्य और परिस्थितिजन्य साक्ष्य जरूरी होते हैं। सबूतों की कमी की वजह से सुप्रीम कोर्ट ने महिला को बरी कर दिया।
यह फैसला दहेज उत्पीड़न के मामलों में सबूतों की अहमियत और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को रेखांकित करता है।





