हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: बिना रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट भी वैध है हिंदू विवाह

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल विवाह का रजिस्ट्रेशन न होने से हिंदू विवाह अमान्य नहीं होता। अदालत ने कहा कि पंजीकरण प्रमाणपत्र का उद्देश्य केवल विवाह का आधिकारिक प्रमाण देना है, लेकिन इसकी अनुपस्थिति में विवाह की वैधता पर कोई असर नहीं पड़ता।
यह फैसला आजमगढ़ के सुनील दुबे की याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। दुबे और उनकी पत्नी मीनाक्षी ने 2024 में आपसी सहमति से तलाक की याचिका दाखिल की थी। फैमिली कोर्ट ने तलाक की प्रक्रिया में विवाह रजिस्ट्रेशन प्रमाणपत्र पेश करने का आदेश दिया था। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उनके पास मैरिज सर्टिफिकेट नहीं है और हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में पंजीकरण अनिवार्य नहीं है। इस पर हाई कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत का आदेश विधिसंगत नहीं है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।
जस्टिस मनीष कुमार निगम की बेंच ने अपने आदेश में कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 8 में विवाह पंजीकरण की प्रक्रिया का उल्लेख है, लेकिन पंजीकरण न होने पर विवाह अमान्य नहीं माना जाएगा। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट और अन्य उच्च न्यायालयों के फैसलों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने दोहराया कि विवाह को मान्यता देने के लिए केवल पंजीकरण प्रमाणपत्र को अनिवार्य नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि विवाह पंजीकरण के नियम बनाने का अधिकार राज्य सरकारों के पास है और इसका उद्देश्य केवल रिकॉर्ड और प्रमाणन की सुविधा प्रदान करना है। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त करते हुए तलाक की याचिका पर शीघ्र सुनवाई कर फैसला करने का निर्देश दिया।
इस निर्णय से साफ हो गया है कि हिंदू विवाह की वैधता रजिस्ट्रेशन पर निर्भर नहीं करती। यह फैसला उन मामलों में राहत देने वाला है, जहां पंजीकरण प्रमाणपत्र उपलब्ध न होने पर विवाह या तलाक की प्रक्रिया अटक जाती है।





